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शनिवार, 22 सितंबर 2018

फिल्म मंटो : सच के लिए लड़ते एक लेखक की काबिले-गौर कहानी

‘मंटो’ बायोपिक फिल्म की बहुत समय से प्रतीक्षा कर रहा था। समय-समय पर आने वाले ट्रेलर या वीडियो के टुकड़े इंतिजार को अ-धीरज में बदल रहे थे। आज वह दिन हाथ लग ही गया। कुछ रचनाकार होते हैं जिनके लेखन के साथ-साथ उनके जीवन का भी आकर्षण किसी को खींच सकता है। यह व्यक्तिगत रुचि का मसला हो सकता है। मेरे लिए तुलसी, कबीर, ग़ालिब, निराला, मंटो जैसे रचनाकार लेखन के साथ-साथ अपने जीवन का भी आकर्षण रखते हैं। उनके लेखन से गुजरने की तरह उनके जीवन से गुजरना भी अच्छा लगता है। इसलिए यह फिल्म आते ही आज इसे देखने से खुद को न रोक सका और देखने के बाद एक काबिले-तारीफ फिल्म को देखने की खुशी हुई।

यह फिल्म मंटो की उस मूल-वस्तु की मार्मिक प्रस्तुति है जहाँ सच अकेला लड़ता है। झूठ के महाजाल में उलझे हुए, उससे लड़ते हुए, मंटो को पूरी फिल्म में देखा जा सकता है। यह झूठ का प्रपंच सत्ता का है, संस्थाओं का है, समाज का है, व्यक्ति का है, साहित्यकारों का है, साहित्यिक मानदंडों का है और उनसे लड़ने वाला मंटो एक ईमानदार लेखक की तरह अकेला दिखता है। लेकिन एक विश्वास उसमें है जो उसे निडर किये रहता है। यह सर्जक का विश्वास है। निजी जमीर का विश्वास है। यह जमीर पूरी तरह से एक कलाकार का जमीर है। कलाकार जो ‘अपने जमीर की मस्जिद का इमाम किसी दूसरे को नहीं’ बना सकता। वह अपने सच के साथ जूझ मरेगा, उसे यह गवारा है।

वह मंटो जब स्त्री-दुनिया का सच लिखता है तो लोगों से पचता नहीं। जबकि वह कटु सच्चाई है। जब वह विभाजन का बेबाक सच लिखता है तो वह भी नागवार गुजरता है। साहित्यकारों के लिए वह ‘गुड़ घारी हँसिया’ है जिसे वे न लील पा रहे, न उगल पा रहे। इधर मंटो डंके की चोट पर कहता है कि ‘ये अफसाने इस दुनिया की सच्चाई हैं। अगर आप इन्हें नहीं बर्दाश्त कर पा रहे तो यह दुनिया ही नाकाबिले-बर्दाश्त है!’ मुझे कुँवर नारायण (Kunwar Narain) की ‘बिजूका’ कविता की पंक्तियां यह फिल्म देखते हुए याद आ रही थीं। पूरी कविता आप देखें –

“बोलो – ज़रा ज़ोर से बोलो
ताकि वे भी सुन सकें
जो ज़रा ऊँचा सुनते हैं

डरो मत
अगर तुम सच कह रहे हो
तो तुम आफ़त नहीं
एक सच्ची ताक़त हो।

जानता हूँ ज़ोर से बोलोगे
तो असभ्य माने जाओगे

यह हक़ सिर्फ़ झूठ को है
कि वह ज़ोर से बोले
और विशिष्ट बना रहे।

यह फुसफुसाकर धीरे बोलने वाली सभ्यता
बेहद फुसफुसी है।

कौओं का अड्डा है
यह बिजूका!”

‘मंटो’ देखते हुए ‘बिजूका’ (प्रपंच) पर मंडराने वाले अड्डा जमाए एक से एक कौओं को देख सकेंगे। इनमें वे ही नहीं है जिन्हें खल और कसूरवार कहा जाता है, बल्कि वे भी हैं जो समझदार कहे जाते हैं। बिजूका की संस्कृति में फुसफुसाकर बोलने वाले इन मौकापरस्त समझदारों का कम योगदान नहीं है।

Manto with wife Safia (left), sister-in-law Zakia Hamid Jala
फुसफुसाकर बोलने वाली मौकापस्त ‘प्रगतिशीलता’ की हकीकत ‘मंटों’ फिल्म में उजागर हुई है। आजादी और भारत-विभाजन के बाद मंटो पाकिस्तान चले गये लेकिन उनके आइने में दोनों देशों की हकीकत चीखती है। चाहे भारत के तरक्कीपसंद हों, चाहे पाकिस्तान के तरक्कीपसंद हों, उन्हें मंटो नहीं पच रहे। बंबई का तरक्कीपसंद लेखक भी उनको लेकर सहज नहीं है। पाकिस्तान में फैज अहमद फैज जैसा प्रगतिशील भी उन्हें साहित्यिक विशिष्टता के बरअक्स कम-साहित्यिक पा रहा है। वह भी अदालत में! जहाँ तेज-तर्रार होकर सत्ता के खिलाफ और साहित्यकार के साथ आना है, वहाँ किन्तु-परन्तु के साथ हाजिर हैं कर्नल फैज अहमद फैज। इस पर मंटो का यह कहना उनके बेकाक स्वभाव, और फैज के मूल्यांकन, का प्रमाण है कि ‘बेहतर होता कि फैज अहमद फैज भी मुझे फह्हाश (अश्लील) लिखने वाला बोल देते।’

फिल्म के लिए निर्देशक ने जो विषय-वस्तु उठायी है वह बीती, बीसवीं, सदी की है। विगत से हम जो भी व्यक्ति-घटना-वस्तु-संदर्भ लाते हैं, उसकी एक ‘रचना’ कर रहे होते हैं। इस अर्थ में फिल्म मंटो एक रचना है। इस रचना में लाजमी तौर पर अपने वर्तमान के सवालों की मौजूदगी होती है। ऐसा मंटो में भी है। लेकिन यह मौजूदगी सहज संभव हुई है। आज का कोई संदर्भ चस्पा करके नहीं। प्रासंगिकता इससे और सघन होती है। यों भी एक ईमानदार जीवन कब प्रासंगिक नहीं होता! हर युग में यह जीवन जीना चुनौती बना होता है। मंटो होना तब ही कठिन नहीं था, आज भी कठिन है और आगे भी रहेगा।

इस फिल्म में जो सवाल आपको मथते हैं वे आज भी हमारे सामने हैं। ‘पहचान’ का सवाल आज भी उतना ही उग्र है। ‘राष्ट्रीयता’ के सोच की भयंकर सीमाएँ हमारे वर्तमान की जिंदगी का भी सच हैं। सांप्रदायिकता का जहर क्या भारत विभाजन के बाद खत्म हो गया! धर्मांधता की समस्या किस कदर कहर ढा रही, प्रतिदिन का हमारा जीवन इसका गवाह है। ‘अभिव्यक्ति की आजादी’, जिसे मंटो मुकदमे-दर-मुकदमे झेल रहे थे, वह आज भी संकट में है। एक फिल्म-रचना के रूप में यह फिल्म नित-नवीन है। अगर वर्तमान की समस्याओं से आप ऊँघे हैं, तो यह फिल्म आपको झकझोरती है।

निर्देशक ने बड़ी कुशलता से अभिव्यक्ति के प्रति ईमानदार एक रचनाकार की त्रासदी और पूरे समाज की त्रासदी को एक दूसरे में मिला दिया है। जोकि मिली है भी। इसे अलग-अलग देख पाना संभव नहीं है। सिस्टम से लड़ते हुए व्यक्ति के रूप में निराश-हताश और जर्जर हो रहे मंटो के निजी दुख का कौन सा सिरा है जो सामाजिक विडंबना से नहीं मिला है! इस दुख के सागर में पूरे समाज की विकृत चेहरा डूब-उतिरा रहा है। परिवार के बीच में मंटो का दुख देखें या श्याम की मित्रता के संबंध में मंटो का दुख देखें; समाज के घटिया मूल्य और मान्यताएँ कहाँ नहीं बेड़ा गर्क कर रहीं!
  
Manto with his friend Shyam from film Manto
मार्मिक स्थलों को इस फिल्म में महत्व दिया गया है, या कहें कि उन्हें सिनेमाई सघनता दी गयी है। जैसे, ‘आइडेंटिटी’ के सवाल को फिल्म में सिनेमायित होते देखते हैं। समाज में ‘पहचान’ का संकट कितने सूक्षम स्तर पर काम करता है, समस्या पैदा करता है, इसे बताने के लिए मंटो और श्याम की दोस्ती पर्याप्त है। मंटो बंबई नहीं छोड़ने वाले थे। उनकी मां, पिता और बेटा वही दफ़्न हैं। उन्हें बंबई से गहरा लगाव है जिसे जीवन भर नहीं भूल पाते। लेकिन क्या हुआ कि उन्हें बंबई छोड़ना पड़ा। जब अपने प्यारे कलाकार दोस्त श्याम ने भी उनकी पहचान एक मुसलमान ही के रूप में की तब वे टूट गये। भले उसने रोष में बात कही हो। किन्तु यह बात दूसरे कलाकार को तोड़ गयी। ‘मारने भर को तो मुसलमान हूँ ना!’ यह बात एक गहरी चोट और कचोट देती है। यह कील जितनी दोस्ती में गड़ी है, उतनी ही समाज में भी।

सधे हुए संवादों को रखने के मामले में भी यह फिल्म उत्कृष्ट साबित हुई है। वे संवाद क्लासिक हैं ही जिन्हें मंटो के लेखन से लिया गया है। उनकी चमक हमारी आज की रोजमर्रा की जिंदगी में भी फीकी नहीं। ये संवाद जितने ‘बोलते’ हैं उतने ही सोचने के लिए कुरेदने वाले भी हैं। ये संवाद इंसान के पाखंड को बेपर्द करते हैं और पाखंड हर दिशा में फैला है, इसलिए हर तरफ़ सही साबित होते दिखायी देते हैं। जैसे एक संवाद है, जिसमे जन-रुचि के ठेकेदार बनने वाले से मंटो मुखातिब होते हैं - ‘तुम हरगिज यह नहीं तय कर सकते कि इसे पढ़ कर लोग कैसा महसूस करेंगे।’ आज देखिये तो जन-रुचि के ठेकेदारों का यह बड़ा प्रिय तर्क है कि लोग यह सोचेंगे, लोगों की भावना इस तरह आहत होगी, आदि। इसी तर्क से वे कभी किसी रचना या फिल्म पर लोगों से बवाल खड़ा करवाते हैं तो कभी किसी खास तरह की रचना या फिल्म के ‘ढर्रे’ को मजबूती से जनता के ऊपर थोपते जाते हैं। न सोच में नयापन आ पाता है, न ही कला में। जनता यही देखती है या इसी के साथ अच्छा महसूस करती है या यही जनता की माँग है, ऐसा कह कर फिल्मिस्तान ने वाहियात फिल्मों का ढर्रा लंबे समय तक जारी रखते हुए जनता से जो कमाही की और यह ट्रेंड थोड़ी टूट-फूट के बावजूद जारी है, स्वयं में इस बात का गवाह है। प्रयोग और नये-पन को हतोत्साहित करता ‘ट्रेंड’। ‘मंटो’ फिल्म रूढ़ फिल्मिस्तानी ढर्रों पर भी चोट करती है।

फिल्म के एक सीन में नवाजुद्दीन
नंदिता दास को इस बेहतरीन फिल्म को निर्देशित करने के लिए बहुत-बहुत बधाई! नवाजुद्दीन में अभिनय की जो ‘रेंज’ है, वह इस फिल्म में भी बखूबी देखी जा सकती है। मंटो के किरदार को बहुत कायदे से उन्होंने उतारा है। पूरा साध लिया है। गजब का ‘परफेक्शन’ लिए हुए। पर्दे पर जो देश-काल दिखाया गया है, वह मंटो के समय को प्रत्यक्ष करने में समर्थ हुआ है। फिल्म में बंबई और लाहौर दोनों को देखना दिलचस्प है। सबका नाम नहीं ले सकता लेकिन लगभग सारे अभिनय करने वालों ने बहुत सफाई से किरदार निभाया है। मुझे कहीं कोई चूक नहीं दिखी। अंततः मैं यह जरूर कहूँगा कि आप भी इसे देख आइए। जरूरी फिल्म है।

नोट : मैं कोई फिल्म समीक्षक नहीं हूँ। फिल्म देखते हुए मुझे जैसा महसूस हुआ और जैसी मेरी तुरंता प्रतिक्रिया हुई, उसे मैंने शब्दबद्ध कर दिया है। ~ अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी / 22-09-2018

रविवार, 24 जून 2012

अनुराग कश्यप का हिन्दी दर्शक-वर्ग को लेकर ब्लाइंड जनरलाइजेशन!

कल रात (दिनांक-२३/६/१२) साबरमती हॉस्टल में फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप आये थे. कार्यक्रम विगत कई कार्यक्रमों की भांति अविनाश दास- प्रकाश के.रे. की अगुवाई में हुआ. हॉस्टल मेस में. बातचीत प्रश्नोत्तर शैली में हुई. 

अनुराग कश्यप की इमेज एक ऐसे निर्देशक के रूप में बनी हुई है जिसने नई जमीन बनाने की कोशिश की हो. इस बात का सम्मान फिल्मों के गंभीर दर्शकों ने सदैव किया है. पर अफ़सोस कि अनुराग कश्यप से हम जिस उम्मीद के साथ मिलने गए थे वे उसपर खरे नहीं उतरे. उनकी बातें चौंकाने वाली लगीं. 

अनुराग जी हिन्दी समाज में फिल्मों का स्तर गिरा होने का कारण दर्शकों को मानते हैं. वे दो टूक कहते हैं कि फिल्म कैसी आयेगी, यह दर्शक डिसाइड करता है. यानी खराब फ़िल्में आ रही हैं तो उसकी वजह निर्देशन-परिवेश कतई नहीं बल्कि दर्शक-परिवेश है. अनुराग जी की इस बात का पचा पाना कठिन है. हमें देखना होगा कि इस दर्शक-समाज को बनाया किसने है. खराब फिल्मों में अपने को गुमाना क्या इस दर्शक-समाज  का मूल स्वभाव है या यह अब तक निर्देशकों द्वारा निर्मित की हुई दीर्घकालिक प्रक्रिया की पैदावार है. फिर यदि ऐसे ही यथास्थितिवादी तर्क/उत्तर हमें मिलने हैं तो हमारे लिए अनुराग कश्यप जैसों का क्या मूल्य/मतलब! अंततः आप उसी तर्क की ओर बढ़ रहे हैं जो बाजारू-निर्देशकों का होता है यानी नशा मांगे कोई तो उसे नशा परोसो, कमाओ. सवाल हो तो कहो कि यही दर्शकों की मांग है. ऐसी स्थिति में 'दबंग' का निर्देशक और 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' का निर्देशक यथास्थितिवादी तर्कों के सामान धरातल पर दिखते हैं. 

दर्शक क्या चाहता है? यह एक विचारणीय प्रश्न है. इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती. लेकिन इस सवाल पर जैसा साधारणीकृत बयान अनुराग साहब दे रहे हैं वह ब्लाइंड किस्म का जनरलाइजेशन है. क्या पेज-थ्री, तारे जमीन पर आदि फिल्मों के लिए दर्शक-वर्ग गायब हो जाता है? हिन्दी दर्शक-वर्ग पर इस तरह एकतरफा निष्कर्ष नहीं रखा जा सकता कि वह अच्छी फिल्मों का विरोधी है. अनुराग कश्यप हिन्दी दर्शक-वर्ग से खासे निराश हैं, शायद इसीलिये दो-तीन दिन पहले दिए एक साक्षात्कार में वे अपनी फिल्मों के लिए हिन्दी दर्शक वर्ग से ज्यादा विदेशी दर्शक वर्ग को तरजीह देते दिखे, शायद इसीलिये वे 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' में विषय-निर्वाह और कहानी की कसावट को भाषा की छौंक-बघार से पूरा करने की कोशिश में दिखे, शायद इसीलिये वे बातचीत में कहते हैं कि 'मुझे कई बार लगता है कि मैं अपना बेस्ट दे चुका हूँ अब आगे आने वाली पीढी इसे बढ़ाए', शायद इसीलिये वे बाजारू तर्क-विन्यास में उलझते हुए दीखते हैं! यह तो एक पक्ष है, वहीं दूसरी ओर वे अपनी सिद्धान्त-निष्ठा का इजहार अक्सर इंटरव्यू में  करते रहते हैं, जैसे मैं समझौतापरस्त फ़िल्में न बनाने के कारण उधार में रहता हूँ, मेरा घर,गाड़ी भी नहीं ले पाता ...आदि-आदि. ये तमाम विरोधाभास क्यों! 

फिलहाल बातचीत से यह समझने में आया कि सारी जद्दोजहद फन्ने-खाँ  बन पाने  तक ही है. ये (कला माध्यमों की) क्रांतिकारिता/परिवर्तनकामना ख़ास पायदान तक के पहले का मंगलाचरण हुआ करती है. उसके बाद तो बदलाव आता ही है. निर्देशक का व्याकरण/खेल-नियम बदल जाता है. इससे क्या इंकार कि  प्रकाश झा भी कभी अनुराग कश्यप जैसा महसूस किये हों कि मैं 'दामुल' में अपना बेस्ट दे चुका हूँ अब आगे आने वाली पीढी इसे बढ़ाए! यह बदलाव उन्हें भले शोहरत और बड़ा दर्शक-वर्ग दे देता हो लेकिन बनती हुई नयी जमीन को, वैकल्पिक जमीन को बंजर जरूर बना देता है. अगली पीढी के लिए बढ़ाने की संभावना को बड़ी रुकावट यही डाल दी जाती है. एक दर्शक-वर्ग, जो संख्या में भले कम हो लेकिन होता है उतना ही समर्पित, इससे छला हुआ महसूस करता है. यह हिन्दी सिनेमा का दुर्भाग्य है कि अपना व्याकरण/खेल-नियम बदलकर छलने वाले   निर्देशक बहुतेरे हुए हैं. यहाँ सार्थक बदलाव, परिवर्तन-कामना कभी भी मुख्यधारा का सत्य नहीं बन सकी, अकाल मौत पाती रही. मुझे लगता है कि गंभीर-सार्थक सिनेमा का बड़ा दर्शक वर्ग न होने का असली कारण यही  है जिसे चालाक निर्देशकों द्वारा दर्शक-वर्ग की ख़ामी बताकर पेश किया जाता है. 


अपडेट: इस पोस्ट का संपादित-संशोधित रूप आज २८-६-२०१२ के ’जनसत्ता’ अखबार में। (साभार http://blogsinmedia.com )

शनिवार, 17 मार्च 2012

अगर एनएसडी 20 बार रिजेक्ट करता तो भी मैं एक्टर ही होता!

यह वार्तालापी-पोस्ट मोहल्ला-लाइव साईट पर पूर्व प्रकाशित हो चकी है, कई महीने पहले. इसे यहाँ 'संग्रहण' के निमित्त रख रहा हूँ. इस पोस्ट के साथ कुछ मत-भेद भी रहे जिसको समेटते हुए मनोज वाजपेयी जी ने अपना पक्ष भी रखा था. कई कमेंन्ट्स रहे, जिससे उक्त लिंकों पर जाकर रूबरू हुआ जा सकता है.(Amrendra)
 जेएनयू में विगत 18 अक्टूबर की शाम इस मायने में अहम रही कि वह एक ऐसे अभिनेता से मुलाकात के रूप में गुजरी, जिसे हम इस घोर बाजारू समय में भी संभावना और आशा की देहरी पर बा-फर्ज मुस्तैद पाते हैं। ये अभिनेता हैं, अभिनय की कला के सच्चे पारखियों के चहेते मनोज वाजपेयी, जिनकी जीवटता अभी भी उसी चमक के साथ कहती है कि ‘अगर एनएसडी 20 बार रिजेक्ट करता तो भी मैं एक्टर ही होता’। ऐसे जीवट व्यक्तित्व से रूबरू होने का यह सुखद और प्रेरक संयोग मुहैया कराने में अविनाश (मोडरेटर, मोहल्ला लाइव) और प्रकाश के रे (संयोजक, सिनेमेला) की भूमिका रही। इस पूरी मुलाकात की रीति आरंभ में मेहमान के भाषण और फिर सवाल-जवाब से अलग शुरुआत से ही संभाषण की रही। इस फॉर्मेट के तहत आधे घंटे से अधिक अविनाश जी के सवालों का उत्तर मनोज जी ने दिया और फिर श्रोताओं की तरफ से सवाल किये गये। कुछ प्रश्नों का और उस पर दिये गये उत्तर का जिक्र यहां कर रहा हूं…
अभिनय की किसी भी तरह की कोई पृष्ठभूमि न रहने पर भी सफलता और सार्थकता के विशिष्ट स्थान पर पहुंचे हुए अभिनेता से सर्वप्रथम यही प्रश्न आकार लेता है कि उसने कैसे इस विषय में सोचा, वह कैसे आगे बढ़ा, क्या दिक्कतें आयीं, कैसे इस मुकाम तक पहुंचना संभव हुआ! गौरतलब है कि मनोज जी बिहार के एक पिछड़े जिले नरकटियागंज के बेलवा गांव से ताल्लुक रखते हैं, जहां से अभिनय को कैरियर बनाने वाले व्यक्ति के सामने एक नहीं अनेक दिक्कतें आयी होंगी। एक सामंती संस्कारों को ढोने वाले समाज, जो कला-रूपों को नाच-गाना कह अनुदारता ही बरतता हो, से अपनी अभिनय-यात्रा के बारे में मनोज जी ने जवाब के क्रम में बताया :
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“मेरे घर-गांव में अभिनय को अच्छा काम नहीं माना जाता था। कोई सकारात्मक आधार नहीं था। पर मुझे बचपन से ही बेहद लगाव था अभिनय से। लगता था कि इसके अलावा कोई काम मैं नहीं कर सकता। पर किसी से कहता नहीं था कि आगे चल कर मुझे यह करने का इरादा है। सारी बात अपने मन में ही रखता था। दिल्ली आकर थिएटर करने लगा। घर के लोगों को जाकर बताया कि मैं अभिनय के क्षेत्र में ही जाऊंगा। विरोध हुआ, लोग नाराज भी हुए। जब मैं घर गया, तो लोगों ने मुझसे बात नहीं की। कई दिनों तक असंवाद बना रहा। एक दिन दुवार पर सब लोग बैठे थे, तभी गांव के एक 90 साल के बुजुर्ग आये और एकाएक हम लोगों के सामने मटक कर नाचने लगे। मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था। फिर वह रुके और मुझको देख कर कहने लगे – ‘‘का हो, तुहूं इहs कुल करै लगलs!” लेकिन मैं हमेशा स्पष्ट था कि मुझे हर हाल में अभिनय ही करना है। अगर एनएसडी 20 बार रिजेक्ट करता तो भी मैं एक्टर ही होता।”
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एक संवेदनशील अभिनेता के लिए निहायत ‘टू द प्रोफेशन’ हो पाना भी एक कठिन चुनौती है। वह किरदार स्वभाव-प्रभाव को अपने जीवन में आने ही न दे, यह एक कठिन साधना है। जिस अभिनेता को कई किरदारों का अभिनय करना हो, तो उसे यह कठिन साधना करनी पड़ती है। इस संदर्भ में मनोज जी ने आपबीती बतायी :
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“किरदार के प्रभाव से जीवन को एकदम दूर रखना शुरू में मेरे लिए भी कठिन था। पर बाद में अभ्यस्त हो गया। ‘शूल’ फिल्म आने के बाद मुझे दृढ़ता से किरदारों से कटना आ गया। ‘शूल’ फिल्म में निभाये गये किरदार का प्रभाव मेरे मनो-मस्तिष्क में बुरी तरह बैठ गया था। जीवन असंतुलित हो गया था। साइकाट्रिस्ट की सहायता लेनी पड़ी। मुझे कुछ वर्षों के लिए अभिनय से दूर रहने की सलाह भी दी गयी। यह मेरे लिए कठिन था। मैंने स्वयं को मजबूत किया। ‘शूल’ फिल्म के बाद ऐसी स्थिति फिर नहीं आयी।”
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फिल्मी दुनिया में बिहार की उपस्थिति को लेकर कई मित्रों के सवाल रहे, इसलिए भी कि मनोज जी स्वयमेव बिहार से हैं। सवाल थे कि शूटिंग बिहार में क्यों नहीं होती, बिहार को लेकर एक नकारात्मक छवि क्यों है, आप भोजपुरी फिल्मों में क्यों नहीं अभिनय करते… आदि। इन सब बातों के जवाब में उन्होंने कहा :
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“ऐसा नहीं है कि बिहार में शूटिंग नहीं हुई। मैं खुद शूटिंग में रहा हूं। रबीना टंडन के साथ शूल फिल्म की शूटिंग वहीं हुई है। दरअसल कई बातें आती हैं। पहली बात यह कि बिहार का प्रशासन हमारी कितनी सहायता करता है। मैं जब शूटिंग पर गया था तब प्रशासन ने पूरा वादा किया था कि कुछ भी बुरा नहीं घट सकता, प्रशासन ने तमाम दिक्कतों के आने के बाद भी वादा निभाया। प्रशासन आगे भी ऐसे ही साथ रहे, तो ऐसी संभावनाएं और भी बनेंगी। दूसरी बात है आर्थिक। फिल्‍म की शूटिंग के दौरान कई बार आवागमन करना होता है, यातायात व्यवस्था की खराबी महंगे फेर में फंसा देती है।
…. मैंने भोजपुरी फिल्मों में काम अभी तक नहीं किया है तो उसका कारण है कि मुझे पसंदीदा कहानी नहीं मिल रही है। स्तरीय फिल्म हो, स्तरीय कहानी हो तो भोजपुरी फिल्मों में अभिनय से मेरा कोई विरोध नहीं है।
…. अगर लोग बिहार की नकारात्मक छवि को लेकर आपकी मुठभेड़ होती है, तो उसको एवॉइड करने की जरूरत है। यह समझ ‘बिहारी’ कहने वाले के सीमित दिमाग की दिखाती है। समझदार भी बेवकूफ जैसी बातें कर सकते हैं, तो क्या ध्यान देना उस पर। ’92 में बाबरी मस्जिद के हंगामे के दौरान मेरी पत्नी (शबाना रजा) से स्कूल टीचर ने कहा कि यह सब तुम लोगों की वजह से हो रहा है। वह बहुत दुखी हुई और घर आकर अपने पापा से इसका जिक्र किया। पापा ने कहा कि कभी-कभी टीचर भी बेवकूफी की बातें करते हैं। जिन्हें हम समझदार कहते हैं, वे भी मूर्खता भरी बातें करें, तो उसे गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है।”
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बंबई नगर की बाजार-संस्कृति में अभिनेता का मूल्य-जाग्रत बने रहना या उस कोशिश को अपने अंदर बनाये रखना चौंकाता अवश्य है। जाने कितने गये सही सही और फिर गये-गुजरे हो गये। जाने कितने मूल्य-प्रेमी बजारू-बयार के सामने टिक न सके। मनोज जी ने जेनुइन किरदार को लेकर अपनी बावस्तगी लगातार बनाये रखी, फलतः टकही-अधोपतन के शिकार नहीं हुए। इसलिए गंभीर श्रेणी का श्रोता-दर्शक-वर्ग मनोज जी का मुरीद भी है। इस संदर्भ में वे कहते हैं :
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“बाजार से पूर्णतया कटा भी नहीं जा सकता। हमें बाजार का उपयोग करना चाहिए, पर इसी का हिस्सा नहीं बन जाना चाहिए। हिस्सा बन जाने से फिर दिमाग में बाजार के दोष भी घर कर लेते हैं। बाजार माध्यम है, इसका बुद्धिमानी से इस्तेमाल करना चाहिए, लेकिन बाजार को ही सबकुछ नहीं मान लेना चाहिए। लोग कहानी सुनाने के लिए मेरे पास बैग भर कर पैसे लाते रहे हैं। यह कहते हुए कि यह तो सिर्फ सुनने के लिए है! पर मैं किसी कहानी को अपनी तरफ से किरदार के लिए तभी निश्चित करता हूं, जब वह मुझे संतुष्ट करती है। जब मेरा मन कह देता है।”
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निश्चय ही यह एक विवेकवान अभिनेता की कुशलता है कि वह बाजार और मूल्यवत्ता दोनों के बीच संतुलन बनाये रखे। इसलिए मनोज जी सराहनीय हैं, पर इसी मौके पर एक संदर्भ को रखना अप्रासंगिक नहीं होगा, जिससे आज ही पढ़ने के क्रम में रूबरू हुआ। संभवतः यहां मनोज जी अपने सिद्धांत में चूके हैं। बात निर्देशक अनुराग कश्यप की जुबानी है, जिनकी निर्देशक के तौर पर भूरि-भूरि सराहना मनोज जी करते हैं। अनुराग साहिब का कहना है –
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‘मैंने ‘शूल’ में मनोज और रवीना के साथ काम किया था। जब ‘पांच’ की नींव गढ़ी गयी तो उन दोनों को सुनाया था। मनोज को बोला था, ये करना है। कहानी सुनायी थी रवीना को और बोला था कि करना है। दोनों करने के लिए रेडी थे। बाद में उन्हें लगने लगा कि मैं अभी काम का नहीं हूं। मनोज ने बोला कि 17 लाख रुपये चाहिए। रवीना बोलीं 17 लाख चाहिए। जामू जी तैयार थे फिल्म करने को। उन्होंने बोला कि 1 करोड़ 80 लाख के अंदर बना कर दो। बाद में जब फिल्म बनी तो 1 करोड़ 11 लाख में बनी थी। लेकिन 1 करोड़ 80 लाख में भी उस समय भारी लग रही थी। मैं इतना ज्यादा डिसइलूजन हो गया कि एक दिन गुस्से में मैंने तय किया कि मैं उनके साथ फिल्म बनाऊंगा, जिन्होंने कभी फिल्म नहीं की हो। हर नये आदमी के साथ फिल्म बनाऊंगा। चालीस लाख, पचास लाख में फिल्म बनाऊंगा … और स्टार सिस्टम पर निर्भर नहीं रहूंगा।’
[ संदर्भ http://chavannichap.blogspot.com/2008/11/0-1993-0-0-0-1993-0-1995-0-0-0-0-0-0.html ]
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एक अभिनेता की निर्मिति में कई निर्देशकों का योगदान होता है। अभिनय में निखार की दृष्टि से। निर्देशकों की अलग-अलग विशेषताओं को एक अभिनेता अच्छे से पढ़ता भी है। मनोज जी के अभिनय का सफर कई अभिनेताओं के साथ में बीता है। इन अभिनेताओं के जिक्र के साथ मनोज जी ने बताया :
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“अलग-अलग निर्देशकों की अलग-अलग विशेषताएं भी हैं। काफी कुछ सीखना हुआ सभी से। शेखर कपूर ने मुझे बताया कि कैमरा देखो ही मत, बस अपना अभिनय करो। कैमरे से अप्रभावित रहने की ट्रेनिंग वहीं से हुई। रामगोपाल वर्मा इंपल्सिव स्वभाव के हैं। उनके साथ हमें हरदम एलर्ट रहना पड़ता है कि कब कह दें कि 500 किलोमीटर चल कर शूटिंग करनी है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा का मामला ठीक उलट है। बहुत ठहराव के साथ काम करते हैं। इत्मीनान से। डाक्टर चंद्रप्रकाश किसी भी कहानी की पूरी पृष्ठभूमि का पता करके काम करते हैं, जैसे यह पेड़ क्या 1960 में था? बहुत परफेक्‍शनिस्ट हैं। प्रकाश झा मल्टीटास्किंग कर लेते हैं। दिन भर शूटिंग भी देख लेंगे और फिर इस सबसे एकदम हटकर अपने मल्टीप्लेक्स पर फोन करके वहां की देखरेख की पूरी जानकारी भी ले लेंगे। इसके बाद भी कोई हड़बड़ी नहीं दिखाते। महेश भट्ट साथ वाले को पूरा स्पेस देते हैं। श्याम बेनेगल इंटेलेक्चुअली सैटिस्फैक्‍शन चाहते हैं, इससे कोई कंप्रोमाइज नहीं करते, कहानी में रुक-रुक कर बदलाव लाते रहते हैं। अनुराग कश्यप आज के दौर के सबसे महत्वपूर्ण निर्देशक हैं। इनके पास सभी निर्देशकों की अच्छाइयां मौजूद हैं। सिनेमा की एक मुकम्मल समझ रखते हैं। इनकी फिल्में आपको बीच की (एवरेज) नहीं मिलेंगी। या तो बहुत अच्छी लगेगी या बहुत खराब। इस समय में दिवाकर बैनर्जी, नीरज पांडेय, विशाल भारद्वाज जैसे महत्वपूर्ण निर्देशक भी मौजूद हैं।”
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अक्सर सफल अभिनेता राजनीति में भी पारी खेलने के इच्छुक दिखते हैं। मनोज जी से प्रश्न पूछा गया कि क्या उनकी भी ऐसी कोई योजना है! इसके जवाब में उन्होंने कहा :
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“फिलहाल मेरी इच्छा अभिनय तक ही है। राजनीति में जाने की बात सोचने में भी डर लगता है। वहां हम जैसों का टिक पाना बहुत कठिन है। फिल्म में ‘करारा जवाब मिलेगा’ (राजनीति फिल्म में मनोज जी द्वारा अभिनीत बहुचर्चित डायलाग, जिसे जेएनयू में श्रोताओं ने वन्स मोर कह-कह कर सुना…) कहना आसान है लेकिन राजनीति में करारा जवाब दे पाना बहुत कठिन।”
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और भी कई प्रश्नों से बातचीत का सिलसिला पूरा होने के बाद मनोज जी को फैन लोगों ने गजब का घेर लिया। इस लोकप्रियता को देखकर खुशी हो रही थी। लोग फोटो/आटोग्राफ लेने के लिए उद्धत थे। स्टूडेंट-एक्टिविटी-सेंटर/टेफ्ला (वेन्यू) से आने के बाद 15, महानदी होस्टल में मनोज जी के साथ हम मित्रों की देर तक बैठकी हुई। बहुत सी बातें हुईं। बिना औपचारिक हुए जिस आत्मीयता से मनोज जी हम सभी से बात कर रहे थे, लग ही नहीं रहा था कि इतना बड़ा अभिनेता यूं सहज होगा। मनोज जी को करीब से जानने-समझने का मौका मिला, यह एक सुखद और स्मरणीय अनुभव रहा।

बुधवार, 11 जनवरी 2012

“द डर्टी पिक्‍चर” और व्यावसायिक छल

“I am playing Silk in the Dirty Picture and Silk is a dancing star in the 80s, since the film is based in the 80s and she is someone who wears her heart, her mind, her sexuality, everything on her sleeve. She is a lot of fun, she is very brazen and I think her brazenness, her attitude was the large part of the reason that she went on to become a huge star, and here, may I add before anyone asks me, that this is not based on the life of Silk Smitha, the heroine of the The Dirty Picture is a dancing star of the 80s and we all know that Silk Smitha was a huge dancing star of the 80s.” ~ Vidya Balan

एबी सी… हर ग्रेड की फिल्में होती ही हैं। सबके वजूद के अपने तर्क हैं। हम बहुत सुरुचिपूर्ण होकर एक की तारीफ कर सकते हैं, पर किसी दूसरे को पूरी तरह खारिज नहीं। फिल्म-समीक्षाओं की अपनी सीमाएं भी हैं, फिर भी कई दोष ऐसे होते हैं, जिन पर समीक्षाएं परदा डाल देती हैं। समीक्षाओं की एक अति का छोर वह मीनमेख-निकालू प्रवृत्ति है, जिस पर झुंझला कर किसी जर्मन फिल्मकार ने कहा था कि मैं फिल्में निरक्षरों के लिए बनाता हूं। वहीं दूसरी अति है सच्चाई का न बोलना। जैसे कोई सी ग्रेड की फिल्म हो, तो हम उसे भी ए ग्रेड की फिल्म कह के समीक्षित कर दें। उसके फेवर में मारे गर्दा उड़ा के रख दें। ऐसा करने के मूल में व्यावसायिक संस्कार होते हैं, और छूट लेकर कहूं तो व्यावसायिक छल। क्योंकि व्यावसायिक संस्कार को हम कुछ सकारात्मक कह सकते हैं लेकिन इस व्यावसायिक छल को नहीं। इसमें यह कोशिश होती है कि हर ग्रेड का देखैया उस फिल्म की ओर लुभा जाए। ऐसी ही कई समीक्षाओं को देखकर मैं हाल ही में आयी पिक्चर ‘द डर्टी पिक्चर’ देखने गया, और छले जाने का एहसास हुआ। समीक्षाओं के साथ स्टार की नत्थी भी क्या खूब होती है! अक्सर फिल्म देखने के बाद ये तारे अपनी चमक और विश्वसनीयता फीकी कर हैं।

पहली दिक्कत मुझे यही दिखती है कि इस फिल्म को सही-सही क्यों नहीं कहते कि यह सिल्क स्मिता के जीवन पर सिनेमा है। फिल्म-निर्माण से लेकर फिल्म-समीक्षा तक ईमानदारी का इतना अभाव क्यों है! या तो आप सिल्क स्मिता का किसी भी रूप में जिक्र न करें और अगर करें तो ठीक से करें। आशय यह कि जीवनाधारित सिनेमा की जिम्मेदारियों का निर्वाह करें नहीं तो ‘है भी और नहीं भी है’ वाला गेम न खेला जाय! वस्तुतः इसमें एक शातिरपना दिखता है, वह यह कि ‘है भी’ का पूरा लाभ ले लिया जाए और जब दिक्कत या जवाबदेही बने तो ‘नहीं है’ की छूट से काम चला लिया जाए। एक तरफ प्रगतिशीलता-संवेदनशीलता-गंभीरता की समाई दिखायी जाए और दूसरी तरफ हल्केपन-वायवीपन के तुक को भी साध लिया जाए। एक तरफ ए ग्रेड के दर्शकों को लुभा लिया जाए तो दूसरी तरफ अन्य ग्रेड के दर्शकों को भी ललचुआ लिया जाए। 80 का दशकीय दौर भी चुना जाता है, दक्षिण भारत का परिदृश्य रचा जाता है, फिल्म में ‘सिल्क’ नाम भी उसी छवि को दिखाने के लिए रखा जाता है; तब भी कहते हैं कि हम कुछ अलग रच रहे हैं। हुई समीक्षाओं का भी श्री-गणेश इसी के साथ होता है! फिर इस लुकाछिपी या खिचड़ी का क्या औचित्य! अगर सिल्क स्मिता जीवित होतीं और यह देखतीं तो क्या वैसे ही बात रखतीं जैसी ये समीक्षाएं! क्या वे जटिलता और समग्रता को लाने की मांग न करतीं! क्या वे न कहतीं कि त्रासदी के साथ इन चटपटे-द्विअर्थी संवादों की भूमिका कैसी! क्या यह फिल्म ‘सिल्क’ की मृत्यु के साथ न्याय कर सकी है! वैसे इन सब सवालों से बचने का एक खूबसूरत उत्तर तो है ही कि ‘यह फिल्म सिल्क स्मिता पर नहीं है’!

जहां-तहां इस फिल्म के संवादों पर लोग कहते दिखे कि संवाद अच्छे-अच्छे हैं। पूरी फिल्म में मुझे हंसाऊ संवाद मिले, हृदयस्पर्शी नहीं! ऐसे संवाद नहीं मिले जिनकी कोर कहीं संवेदन-तंत्र को कुरेदे रहे और उसके चित्त में आते ही त्रासदी विचारोद्यत करे जैसे किसी चोट के चिन्ह पर उंगली जाने पर किसी घटना की मार्मिकता हमें अपने साथ ले लेती हो। थियेटर में इन संवादों पर मैने सीटियों और हुल्लड़ के साथ समीप वालों को पाया। मैने पाया कि कहानी की प्रकृति अलग है और संवाद अलग ही परिवेश रच जा रहे हैं, अलग असर डाल रहे हैं। संवाद त्रासदी-सुलभ करुणा नहीं पैदा कर सके हैं! फिल्म की नजर में और फिल्म में कथित ‘इंटरटेनमेंटx3’ शायद यही हो, पर मुझे रास नहीं आया। कहानी की टूटन और गानों का अहैतुकी समावेशन दर्शक-चित्त को अपने साथ जोड़ पाने में असफल दिखा! ये कमियां हर ग्रेड के दर्शक-वर्ग को साधने की कोशिश का नतीजा हो सकती हैं। फिल्म-समीक्षाकार अजय ब्रह्मात्मज जी की एक बात का जिक्र करना चाहूंगा कि यह फिल्म ‘आम दर्शकों और खास दर्शकों को अलग-अलग कारणों से एंटरटेन कर सकती है!’

लीड रोल के तौर पर विद्या बालन के अभिनय की भूरि भूरि प्रशंसा हुई, जिन्होंने सिल्क का रोल किया है। लेकिन मैं इसे अभिभूत कर देने वाला अभिनय नहीं कह पा रहा। फिल्म की कमियों को कहीं कहीं भरता सा लग सकता है विद्या बालन का अभिनय, लेकिन फिल्म की वैतरणी इससे नहीं तरती। ‘रॉकस्टार’ फिल्म का संदर्भ लेकर कहूं तो उस फिल्‍म में कुछ खास न होने पर भी रणवीर कपूर ने स्वयं जैसे फिल्म की नौका को खे दिया हो, ऐसा इस फिल्म के बारे में नहीं कहा जा सकता।

अपनी बात को खत्म करते हुए कहूंगा कि यह फिल्म एक असफल फिल्म है, उन दावों के साथ तो बिल्कुल ही असफल जो समीक्षाओं में दागे गये। बेहतर होता अलग आधार पर इसे मसाला फिल्म ही बना देते, तो दोनों तरफ से ईमानदारी होती! बिचऊपुर में दुनहूं गवां गये!

पूर्वप्रकाशित: मोहल्ला-लाइव  
~सादर/अमरेन्द्र अवधिया

शनिवार, 24 सितंबर 2011

वर्तमान और भविष्य कुछ भी नहीं बचते, बचता है तो सिर्फ भूत!

श्री चंद्र प्रकाश द्विवेदी 

१६ मई २०११ को फिल्म निर्देशक और अभिनेता श्री चंद्र प्रकाश द्विवेदी जी से हम विद्यार्थियों की मुलाकात हुई थी। इसकी रिपोर्टिंग सर्वप्रथम मैंने अवधी भाषा में अवधी पोर्टल पर लिखी थी, इसका अनूदित खड़ी बोली-हिन्दी रूप मोहल्ला लाइव साइट पर भी प्रकाशित हो चुका है। इसी रूप को यहाँ मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ: 

सोलह मई को हम जेएनयू के विद्यार्थियों की मुलाकात सिने निर्देशक और अभिनेता चंद्र प्रकाश द्विवेदी जी से हुई। द्विवेदी जी अपनी संजीदा कार्यशैली के चलते सिनेमाई भेड़ियाधसान से अलग जगह और जन-विश्वास बनाने में सफल रहे हैं। इसकी दाद वे भी देते हैं, जो उनसे विचारधारात्मक असहमति रखते हैं। ‘चाणक्य’ जैसा महाधारावाहिक बनाना और उसमें उसी देश-काल-परिस्थिति का रंग-ढंग/समाज/चरित्र/भाव समाहित कर देना मामूली बात नहीं है। इन्हीं खासियतों की वजह से द्विवेदी जी बहुतों से अलग साबित होते हैं। ‘पिंजर’ सिनेमा भी उनके लकीर से अलग चलने वाले अपनी धुन के पक्के फकीरी स्वभाव का परिचय देता है। स्टूडेंट एक्टिविटी सेंटर – टेफला में द्विवेदी जी के साथ सिने समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज और अजीत राय भी थे। वैसे तो हुजूर ने आते ही कहा कि घर पर कुछ दिक्कत है, इस वजह से जल्दी निकलूंगा, फिर भी 45-50 मिनट हम लोगों के बीच रहे और सवालों के यथासंभव जवाब देते रहे। इस मुलाकात के विधान में अविनाश की खास भूमिका थी, वहीं प्रकाश के रे का सहयोग पूरे कार्यक्रम को शक्लो-सूरत देने में था। वहां हुई बातों का विवरण प्रश्नों के उत्तर के रूप में रख रहा हूं।

पिंजर ज्‍यादातर लोगों ने देखी है। अमृता प्रीतम की कहानी पर आधारित यह फिल्म देश के विभाजन की मार्मिक प्रस्तुति है। मेहनत और दूरदृष्टि से बनी यह फिल्म दर्शक के ऊपर गहरा प्रभाव छोड़ती है। विद्यार्थियों ने इस फिल्म से जुड़े कई सवाल रखे। अलग अलग प्रश्नों के उत्तर में डॉ साहब का जवाब था…

 पिंजर की अंतर्वस्तु एक बड़े कैनवास की रही। इसलिए वैसा सेट भी बनाया गया। कदाचित यही वजह रही कि इसे श्रेष्ठ सेट के लिए फिल्म फेयर एवार्ड भी दिया गया और लोगों ने इसके निर्देशन को सराहा भी। परंतु व्यावसायिक चुनौती के सामने यह फिल्म असफल रही। अब हमें कथा के साथ साथ मनोरंजन का संतुलन भी रखना होगा। हम भारतीय दर्शक और बाजार की सीधे अनदेखी करके नहीं चल सकते। एकदम समझौता भी नहीं किया जा सकता। पिंजर में ही एक आइटम सांग रखने की बात हो गयी थी। हिरोइन भी तय हो गयी थी। गाना भी पूरा हो चुका था। लेकिन कथा की प्रकृति के विरुद्ध देखकर मैंने उस गाने को फिल्म से बाहर कर दिया था। यानी आज बाजार को समझना, कथा के स्वभाव को ताड़ना और फिर उसी हिसाब से संतुलन लेकर चलना सबसे जरूरी है।
चंद्र प्रकाश जी ने ‘चाणक्य’ धारावाहिक में न केवल निर्देशक के तौर पर काबिलियत का झंडा गाड़ा, बल्कि स्वयमेव ऐसा प्रभावोत्पादक अभिनय भी किया, जो इस महाधारावाहिक के सभी पात्रों पर भारी पड़ गया। साथ ही चाणक्य के चरित्र के क्लैसिक स्पर्श को बखूबी निभा गया। जिया गया अभिनय! इस धारावाहिक का भी सेट कमाल का है। अक्सर इतिहास या मिथक से जुड़ी बातों को कलारूप में रखने में एक जोखिम रहता है। यह जोखिम है किसी व्यक्ति पर पुनरुत्त्थानी होने का तमगा लग जाना। यह जोखिम चाणक्य के साथ भी रहा। प्रगतिशील लोग इस धारावाहिक में प्रस्तुतीकरण-अवधि के दौरान विकसित विचारधारा विशेष के राष्ट्रवादी आग्रहों को लक्षित करते रहे हैं। इसलिए जेएनयू में इस कोण से प्रश्न रखे गये, जिसके उत्तर में उन्होंने अपना इरादा और विचार स्पष्ट किया…
 चाणक्य की बातों को तत्कालीन राष्ट्रवाद से जोड़कर देखना बकवास की बात है। टोटल बकवास! यह हमारी समस्या है कि हम बातों को, अपने समय और समाज को बगैर खांचे में बांटे नहीं देख पाते। हमारे सांस्कृतिक चरित्रों/मिथकों को इतना पॉलिटिकल बना दिया है कि हम सांस्कृतिक चर्चा भी नहीं कर पाते, यह एक त्रासदी है। क्या गलती इतिहास की है, या मिथक की है? या हमारी है? हमें सोचना चाहिए कि अचानक क्या सब घटा कि लोग अब अपने बच्चों के नाम में ‘राम’ जोड़ना नहीं चाहते! समस्या कहां है? क्या चुनौती है? उसका कितना सामना किया जा रहा है? कैसे सामना किया जा रहा है? क्या यह संस्कृति के साथ बहुतेरे सरलीकरण नहीं थोपे जा रहे!
पुराण/इतिहास/मिथक में अपने विचरन को लेकर द्विवेदी जी प्रश्नविद्ध होते रहे हैं। हिंदी साहित्यकार जयशंकर प्रसाद के अतीत प्रेम को लेकर बड़ी खींचातानी होती थी, जुमला फेंका जाता था कि प्रसाद बाबू तो अतीत के गड़े मुर्दे उखाड़ा करते हैं। ऐसे ही द्विवेदी जी को भी लोग कहते हैं कि इनकी अकाल कवलित आत्मा घूम फिर कर अतीत में ही विश्राम लेती है। एक सज्जन ने इसी बात को आगे रख प्रश्न किया, जिस पर उन्होंने उत्तर दिया…
 (किसी की बात को कोट करते हुए…) वर्तमान और भविष्य कुछ भी नहीं बचते, बचता है तो सिर्फ भूत! भूत से हमें सर्वाधिक अनुभव मिलता है, बीते से हम सबसे ढेर सीख सकते हैं।
हिंदी सिनेमा में बाजार और कला दोनों को साधना एक बड़ी चुनौती है। अक्सर कला छोड़ कर बाजार साधा जाता है। बाजारूपन या बाजारू मनोवृत्ति के रूप में। वहीं दूसरी ओर कला साधने वाले बाजार को अछूत समझे रहते हैं, जिससे भौतिक सच्चाई के कारण एक समय के बाद उनकी रीढ़ टूट जाती है और बंबइया नगरी में सिर्फ बाजार ही रह जाता है। गौरतलब है कि चंद्र प्रकाश जी एक संतुलन बिंदु की वकालत करते हैं। कहीं किसी साक्षात्कार में द्विवेदी जी ने कहा था कि ‘हमें एकता कपूर से भी कुछ सीखना चाहिए।’ इस संदर्भ में प्रश्न हुआ तो द्विवेदी जी ने अपना पक्ष रखा…
 एकता कपूर पर कही गयी हमारी बात को व्यंग्य के रूप में लिया जाए। लेकिन एकता कपूर की सफलता से यह सीखने योग्य है कि व्यावसायिक चुनौती को कैसे स्वीकार किया जाए! हम पैसे के तर्क को खारिज करके नहीं चल सकते। चाणक्य ने कहा है कि जब राजा की राजस्व-व्यवस्था में आर्थिक-डांवाडोल आ जाए तो उसे देवी-देवताओं की तस्वीरों को भी बनवा कर/बेच कर अपनी हालत सुधारनी चाहिए। इस तरह सकारात्मक ओढर के तईं इमेज बेचने की बात बहुत पहले से स्वीकारी गयी है। हिंदी सिनेमा बनाने वालों को इन परिस्थितियों में एक जोखिम लेना होगा, उसे एक टाइप बन कर नहीं रहना होगा। श्याम बेनेगल जैसे निर्देशकों के साथ एक टाइप वाली बात बहुत हद तक सही है। आज बाजारू फिल्मकार अच्छा लिखने वालों की स्क्रिप्ट नहीं लेना चाहते, इनकी कोशिश येन-केन-प्रकारेण धन कमाने की होती है। हमें इन जैसा नहीं चलना है, पर थोड़ा सामंजस्य अवश्य बैठाना पड़ेगा। कॉमर्शियल फिल्मों से सीखना भी होगा कुछ। मैं खुद दोस्त अजय ब्रह्मात्‍मज के साथ ‘दबंग’ फिल्म देखने गया था, लेकिन वहां वही दिक्कत है कि दिमाग घर पर छोड़ कर जाना पड़ता है!
बहुत जल्द ही कथाकार काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ पर फिल्म आने वाली है। इसका निर्देशन डॉ चंद्र प्रकाश द्विवेदी ही कर रहे हैं। पिंजर बनाने के बाद द्विवेदी जी ने एक लंबा अंतराल लिया है। इस आने वाली फिल्म में बाजार के साथ एक संतुलन बिठाने की कोशिश की गयी है। यह संतुलन कैसे बैठा है, यह आने वाला समय बतायेगा। इसमें सनी देवल और रवि किशन (भोजपुरी) जैसे लोकप्रिय अभिनय-कर्मियों से अभिनय कराया गया है, इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि एक कलात्मक-साहित्यिक रचना के साथ पूर्व कथित संतुलन कैसे साधा गया है। इस फिल्म से जुड़े प्रश्नों से रू-ब-रू होते हुए द्विवेदी जी कहते हैं …
 इंडिया टुडे मैगजीन में ‘काशी का अस्सी’ की एक कहानी का जिक्र था। पहली बार उसी पर मेरी नजर गयी थी। फिर मैंने पूरी कहानी का पता किया और पढ़ा। फिर उपन्यास तक गया। काशी नाथ जी से संपर्क भी किया। कई बार उपन्यास पढ़ा। फिल्म बनाने में मैंने स्क्रिप्ट के तौर पर उपन्यास में काफी परिवर्तन भी किया है। उपन्यास के आखिरी चैप्टर को छोड़ दिया है। इसलिए आप सभी को उपन्यास और फिल्म में कुछ फर्क भी दिखेगा। एक फिल्म निर्देशक के तौर पर हमें फिल्म में बहुत कुछ जोड़ना-घटाना भी पड़ता है। भाषा के स्वरूप को बचाये रखने की भरपूर कोशिश की गयी है, जिसे अश्लील कहकर सेंसर की तरफ से कोई समस्या तो नहीं होनी चाहिए लेकिन अगर हुई तो कोर्ट-कचेहरी तक भी जाने के लिए तैयार हूं। सनी देवल को उनकी लोकप्रियता के मद्देनजर चुना, किंतु निर्देशन और मेहनत के कारण इस फिल्म में सनी देवल को आप काफी बदले हुए रूप में पाएंगे, अलग रूप में! …आज ही काशी नाथ जी से बात हुई है, जिसमें उनका आग्रह रहा कि पूरा ध्यान इस बात का रखा जाए कि फिल्म आर्ट फिल्म बनकर ही न रह जाए। …कुछ शूटिंग बनारस में की गयी है और काफी कुछ के लिए सेट बनाने की जरूरत महसूस हुई क्योंकि कथा में जो बनारस है, वह पिछले दशकों में बहुत कुछ बदल गया है। सेट इस वजह से बनाना जरूरी लगा ताकि कथा के बनारस में आज का बनारस फांक न डाले। लोग उस समय की कथा को उसी समय के देश-काल-परिस्थिति में देखें। दूसरी बात, सेट रखने से कैनवास मन-मुआफिक बड़ा रखने में आसानी होती है। अक्टूबर तक यह फिल्म आप सभी के सामने आ जाएगी।
पूरी बातचीत के दौरान द्विवेदी जी के भीतर की एक हूक सामने आती रही कि वह भारतीय सिनेमा में किसी ‘भारतीय’ तत्व को शिद्दत से देखना चाहते हैं। कृतियों के जरिये और फिल्मों के जरिये वे इसकी खोज में लगे हैं। वे चाहते हैं कि कोई ऐसी विशेषता उभर कर सामने आये, जिसे कहा जा सके कि यह ‘भारतीय सिनेमा’ है। इस संदर्भ में उन्होंने बताया…
 अगर आप पूछेंगे कि मैं विदेशी फिल्म देखता हूं, तो मेरा जवाब होगा कि नहीं। विदेशी किताब भी नहीं पढ़ता। लेकिन यदि आप पूछेंगे कि आपने प्रेमचंद को पढ़ा है, तो कहूंगा कि हां कई बार पढ़ा है। भौगोलिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूपों से रूबरू होते हुए भारतीयता खोजने की मेरी कोशिश रहती है। इन्हीं को फिल्मों के जरिये देखने की इच्छा भी है। भारतीयता की एक तस्वीर खोजने की जुगत लिये भारतीय भाषाओं में लिखी बहुतेरी कृतियों से गुजरता रहता हूं। भारतीय कृतियों में जहां कहीं सिनेमा दिखता है, उसकी गुंजाइश दिखती है, उसी को गुनने की कोशिश करता हूं। मेरा ज्यादातर समय इसी प्रयास में बीतता है।
हिंदी सिनेमा के आज के परिदृश्य पर बात की गयी तो द्विवेदी जी बचने की कोशिश करते हुए दिखे। किसी पर टीका-टीप करना उन्हें जमा नहीं। इससे यह लगा कि वे आज के इस सिनेमाई परिदृश्य से खुश नहीं हैं। उम्मीद है कि इस असंतोष भरी धारा से हटे और समय की मांग पर डटे निर्देशक की भूमिका द्विवेदी जी निभाएंगे। पूरी बात में उन्होंने वर्तमान परिस्थिति में एक बीच के रास्ते – मध्यम मार्ग – की जरूरत पर खासा जोर दिया। इस प्रयास को वह स्वयं कैसे अंजाम देते हैं, इसे देखना अहम होगा। संभावना यह भी बनती है कि कोई निर्देशक इस प्रयास में प्रकाश झा की राह का अनुगमन न कर डाले क्योंकि कमोबेश ऐसे ही प्रयास में प्रकाश झा ‘दामुल’ का मूल भूलकर बाजारूपन की ‘राजनीति’ के अखाड़े में उलझकर रह गये हैं। द्विवेदी जी से बेहतर की सहज मांग है।
द्विवेदी जी के साथ मैं..
डॉक्‍टर साहब के जाने के बाद हम लोगों के बीच पधारे अजय ब्रह्मात्मज और अजीत राय जी से काफी देर तक बात हुई। अजय जी की चिंता बारंबार रही कि हिंदी सिनेमा में बंबइया प्रभुत्व (हीजेमनी) टूटना चाहिए। बनाने के स्तर पर सिनेमा अन्य दूर-दूर के केंद्रों पर भी बने, विस्तार ले। तब विविधता भी अधिक आएगी। इससे बंबइया सिनेमा की निरंकुशता और नीरसता दोनों टूटेगी। विविध क्षेत्रीय भाषाओं में भी सिनेमा बने और सामने आये। अजय जी फिल्मों पर किसी भी तरह का अंकुश लगाने के तरफदार नहीं हैं। वहीं अजीत राय जी की चिंता रही कि एक मानकीकरण जरूरी है, नहीं तो इस तरह अल्ल-क-बल्ल सिनेमा बनना सिनेमा के भविष्‍य के लिए अच्छा नहीं। लेकिन मानकीकरण कैसे? यह लाख टके का सवाल है। विवादों से भरा। अजीत जी की चिंता थी कि विश्व सिनेमा के सामने हिंदी सिनेमा बहुत पीछे है, इसलिए अंतर्वस्तु के स्तर पर सुधार आवश्यक है, ताकि गलत ट्रेंड खत्म हो।
प्रकाश, समर, विवेक, धनंजय, सरवन, मुंतजिर… आदि छात्र-छात्राओं के सहयोग से वार्ता का एक बढ़िया सिलसिला चला। काफी बातें हुईं। देर रात के बाद सभी अपने-अपने ठौरे-ठिकाने गये।
~ सादर / अमरेन्द्र अवधिया / २४-०९-२०११