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शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

द्वंद्व और काव्य का विकास .

जीवन पर सोचना कविता पर सोचने जैसा हो जाता है | यहाँ द्वंद्व हैं तो वहाँ भी | द्वंद्व भरे जीवन में कविताएं कितने करीब आ जाती हैं ! लगता है ये कवितायें 'कभी कभी पाँव हैं , कभी कभी हाथ हैं ' ( ~त्रिलोचन ) | आश्वासन देती हैं कविताएं | उबार लेती हैं कविताएं | द्वंद्व में सधी होती हैं ये कविताएं , इसलिए जीवन को साधना भी सिखा देती हैं | प्रस्तुत हैं 'द्वंद्व और काव्य के विकास' पर कुछ बातें --- 

'' आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'कविता क्या है' शीषक निबंध में लिखा है कि 'कविता बाह्य प्रकृति के साथ मनुष्य की अन्तः प्रकृति का सामंजस्य घटित करती हुई उसकी भावनात्मक सत्ता के प्रसार का प्रयास करती है |' इस भावनात्मक सत्ता के अन्दर ज्ञान की सत्ता भी है | मनुष्य का बाह्य प्रकृति से साक्षात्कार बुद्धि तत्व और ह्रदय तत्व के द्वारा होता है | इस प्रक्रिया में अनुभूति पैदा होती है | अनुभूति में भी विचार-पक्ष और भाव-पक्ष दोनों हैं | इस अनुभूति को भाषा में व्यक्त किया जाता है तब कविता बनती है | किन्तु बाह्य प्रकृति में क्षण क्षण परिवर्तन हो रहा है क्योंकि परिवर्तन एक शाश्वत प्रक्रिया है | अतः अनुभूति में भी परिवर्तन होना स्वाभाविक है | परिवर्तन की प्रक्रिया के फलस्वरूप प्रतिक्षण कवि पर संस्कारोद्भूत नए सामंजस्य का दबाव भी बढ़ता रहता है |
    यह सामंजस्य व्यापक फलक ले लेता है क्योंकि यह बाह्य और अन्तः प्रकृति का ही सामंजस्य ही नहीं है बल्कि पूर्व की अनुभूति का इस 'नयी' ( इसे भी पुरानी होनी है ) अनुभूति से स्थापित होने वाला सामंजस्य है | अनुभूतियाँ विचारों का सृजन करती हैं और इस तरह विचार भी बदलते रहते हैं | आवश्यक हो जाता है इन विचारों में सामंजस्य ! विगत के प्रति मोह मानव स्वभाव है इसलिए सामंजस्य-वृत्ति में विगत को स्थायित्व देने का प्रयास भी निहित रहता है | गति जीवन का चिरंतन सत्य है | कुछ का छूट जाना गति में आवश्यक है | ऐसी स्थिति में एक तनाव की सृष्टि होती है , द्वंद्व की सृष्टि होती है | जिस तरह सामंजस्य के कई स्तर है उसी तरह द्वंद्व के भी | विकास की यह द्वंद्वात्मक प्रक्रिया है | कविता के लिए इस द्वंद्व की भी उतनी ही भूमिका है जितनी सामंजस्य की | रचना में दोनों सिक्के के दो पहलुओं की तरह रहते हैं | कभी किसी रचना में द्वंद्व अधिक दिख सकते हैं और कभी सामंजस्य | लेकिन दोनों में कोई एकदम अनुपस्थित नहीं रहते | कथाकार-चिन्तक निर्मल वर्मा का मानना उचित है कि 'द्वंद्व की परम्परा उतनी ही पुरातन है जितनी सामंजस्य और शान्ति की' | 
     रचना में द्वंद्वात्मक स्थिति को भक्तिकाल के दो श्रेष्ठ कवियों - कबीरदास और तुलसीदास - की रचनाओं में देखा जा सकता है | संसार के विषय में जो कुछ बतलाया गया है वही पर्याप्त नहीं है | वह 'कागद की लिखी' है | प्रत्यक्ष अनुभव करने पर वही नहीं मिलता | स्थितियों का बदला हुआ सन्दर्भ प्रस्तुत होता है , ज्ञान अर्जन की दृष्टि से | ऐसी स्थिति में एक द्वंद्व होता है जिसमें प्रश्नवाचकता अपने चरम पर हो जाती है | यह द्वंद्व शास्त्र सह लोक प्रवर्तित ज्ञान और अनुभव-प्रसूत ज्ञान के बीच का है | इस द्वंद्व को कबीर की कविता में प्रश्नों की झड़ी के रूप में देखा जा सकता है , लोकोन्मुख व्यंग्य और करुणा के साथ ---
'' कुसल कुसल सब पूछते 
कुसल रहा न कोय |
जरा मुई न भय मुआ 
कुसल कहाँ ते होय || '' 
पूरी भारतीय रचना-यात्रा में तनाव की एक रज्जु 'मृत्यु' की है | इसकी वजह से भी कबीर की कविता में - परम्परा से चला आ रहा - द्वंद्व देखा जा सकता है ---
'' चलती चाकी देखकर 
दिया कबीरा रोय |
दो पाटन के बीच में
      साबुत बचा न कोय || '' 
'जन्म' और 'मृत्यु' का यह प्रश्न अलग ढंग से - नए प्रयोग के साथ - कुँवर नारायण की बहुचर्चित कृति 'आत्मजयी' में देखा जा सकता है | 

    तुलसीदास की रचनाओं में द्वंद्व भी बहुत हैं और द्वंद्व को पाटने के प्रयास ( सामंजस्य ) भी बहुत | यही कारण है कि तुलसीदास 'सामंजस्य की विराट चेष्टा' के कवि कहे जाते हैं | दार्शनिक धरातल पर इस द्वंद्व को हम तुलसी के आराध्य राम की मनुजत्व और ब्रह्मत्व की सहस्थिति के रूप में देखते हैं | 'रामचरितमानस' में यही द्वंद्व पार्वती के प्रश्नों के रूप में प्रकट हुआ है | लौकिक धरातल पर द्वंद्व को तदयुगीन 'कलयुग' और 'रामराज्य' ( तुलसी का आदर्श लोक ) के बीच देखा जा सकता है | ऐसे द्वंद्वों को तुलसी की रचना में देखा जा सकता है जो जनमानस के द्वंद्व थे , जैसे सगुण-निर्गुण के बीच का द्वंद्व | तुलसी द्वंद्वों के समाधान तक जाने का प्रयास करते हैं | इसे परम्परा से प्राप्त प्रश्न का निदान-रूपी ( उत्तर के रूप में ) प्रयोग माना जा सकता है ---
'' सगुनहिं अगुनहिं नहिं कछु भेदा |
उभय हरहिं भव संभव खेदा || 
अगम अरूप अलख अज जोई |
     भगति प्रेम बस सगुन सो होई || '' 
प्रख्यात आलोचक मैनेजर पाण्डेय की स्थापना का स्मरण होता है कि 'कबीर की कविता प्रश्न करने वाली कविता है और तुलसी की कविता उत्तर देने वाली' ! दोनों कवियों की द्वंद्वों से टकराने की अपनी शैली है , अपनी जमीन है | एक में प्रश्न   अधिक हैं और दूसरे में सामंजस्य ! भक्तिकाल हिन्दी साहित्य का स्वर्ण काल कहा जाता है , इसीलिये , यहाँ मैंने परम्परा और प्रयोग के द्वंद्व विषयक इस 'स्वर्ण-पक्ष' को दिखलाने की कोशिश की | '' 
[ ~ अपने लघुशोध 'कुँवर नारायण के काव्य में परम्परा और प्रयोग का द्वंद्व' से ]  

पसंदीदा कविता :

शीर्षक : अभिनवगुप्त [ ~ कुँवर नारायण ] 

'' सावधान आचार्य ! 

सरासर झूंठ बोलता है आइना 
                  वह सब जो हमारे दाईं ओर है 
                  हमारे बाईं ओर दिखाता ,
                  वह सब जो हमारे बाईं ओर है 
                  हमारे दाईं ओर बताता 

अतः 
एक शक की गुंजाइश है वहाँ भी 
कि हम सर के बल खड़े हैं 
या पांवों के बल ?

या 
कहीं ऐसा तो नहीं 
कि आकाश और पाताल को मिलाती 
एक काल्पनिक रेखा 
        जहां दायें बायें को काटती है 
                सचाई का सबसे नाजुक बिंदु वही हो ? ''  [ ~ कुँवर नारायण ]