शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

नारी-निन्दा और तुलसीदास : फादर डॉ. कामिल बुल्के

नारी-निन्दा और तुलसीदास
~ फादर डॉ. कामिल बुल्के

''रामचरित मानस के विभिन्न पात्रों और स्वयं तुलसी की भी ऐसी बहुसंख्यक उक्तियाँ पढ़ने को मिलती हैं, जिनमें नारी के स्वभाव, उसकी शारीरिक दुर्बलता और विवेकहीनता की निंदा की गयी है। किसी भी नारी पात्र से भूल हो जाने पर सम्पूर्ण मातृ-जाति की भर्त्सना की जाती है और रावण की कामुकता के सन्दर्भ में यह कभी नहीं कहा जाता की सभी पुरुष ऐसे ही हैं। 

कुछ लोग रामचरित मानस में नारी-निंदा विषयक उक्तियों का अनोखा अर्थ लगाकर तुलसी को निर्दोष साबित करने का प्रयत्न करते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि तुलसी ने नारी को मुख्यतया कामिनी के रूप में देख कर उसे वासना का प्रतीक बना दिया और साधक होने के नाते उसे साधना में बाधा मानकर उसकी ओर स्वयं सतर्क रहे और दूसरे साधकों को भी सावधान करना चाहा। किन्तु रामचरित मानस गृहस्थों के लिए लिखा गया है और तुलसी की साधना इतनी अपरिपक्व नहीं थी कि उन्हें विचलित होने का डर था।  

वास्तव में रामचरित मानस की कटूक्तियां तुलसी की अपनी न होकर संस्कृत नीति-काव्यों के अनुवाद हैं*। मातृ-जाति के विषय में उनकी अनुदारता उनकी व्यक्तिगत न होकर तत्कालीन विचारधारा(लोकमत) का प्रतिबिम्ब मात्र है, जो शताब्दियों से चली आ रही थी। यदि तुलसी को दोष देना है, तो समस्त भारतीय परंपरा को दोषी ठहराना चाहिए और समस्त विश्व साहित्य को भी, क्योंकि दुनिया भर के साहित्य में मातृ-जाति विषयक निंदात्मक उक्तियाँ पाई जाती हैं। भगवतगीता में भी स्त्री को पापयोनि कहा गया है: येऽपि स्युः पापयोनयः स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्राः (९,३२)

फिर भी मन में एक प्रश्न उठता है। तुलसी जैसे महात्मा ने उन उक्तियों को क्यों दुहराया? मेरी धारणा यह है कि इसका वास्तविक कारण मनोवैज्ञानिक है। तुलसी बचपन से ही अनाथ थे। यदि बालक तुलसी को एक साध्वी माता का लाड़-प्यार मिला होता, तो उन्होंने मातृ-जाति विषयक कटूक्तियों को अपनी रचना में स्थान नहीं दिया होता।''

(सन्दर्भ : रामकथा और तुलसीदास, हिन्दुस्तानी अकादमी, पृ.-६१-६३)
* वाली बात वही है जो चित्र में है। 

-- Amrendra Nath Tripathi./ Patna / 18.4.2020

रविवार, 13 अक्तूबर 2019

पल्ला झाड़ने से बेहतर है कि आत्मसमीक्षा करें


PC - Praveen Khanna 

सनाउल हक़ के मारे जाने की पुष्टि अफगानी स्रोत एनडीएस से हुई है। परसों। वह अफगान सरकार और अमेरिका की संयुक्त आतंकवाद विरोधी लड़ाई में मारा गया। यह आतंकी अलक़ायदा की भारतीय(उपमहाद्वीपीय) कार्रवाई का सर्वेसर्वा था। यह 2014 में अलकायदा प्रमुख अल जवाहिरी द्वारा एक्यूआईएस कर्ताधर्ता बनाया गया। उस समय इसका नाम जो चनल में था, वह था - मौलाना आसिम उमर। 2015 में इसके दो-तीन भारतीय दहशतगर्द संपर्कों को भी पकड़ा गया था। यकीनन इसके मारे जाने से भारत में होने वाली दहशतगर्द कार्रवाइयों को संचालित करने वाले एक शैतान का खात्मा हुआ।

सनाउल सम्भल, उत्तर प्रदेश के दीपा सराय नामक जगह का रहने वाला था। नब्बे के दशक में इसे जिहादी जूनून चढ़ा, अपने घर से अनबन हुई, और सऊदी व पाकिस्तान से होते हुए अफगानी दहशतगर्द इलाकों में सक्रिय हो गया। यह भारत के दारुल उलूम देवबंद में पढ़ा था। पाकिस्तान जाने के बाद वहाँ के दारुल उलूम में पढ़ाई की। उसी जगह से जहां से मौलाना अजहर मसूद जैसे अनेक दहशतगर्द निकले। सना केवल बन्दूक से ही नहीं, लिखने-पढ़ने के स्तर पर भी जेहादी सोच को आगे बढ़ा रहा था। उसने इसके लिए किताबें भी लिखीं। पाकिस्तानी पत्रकार हामिद मीर आसिम उमर (यानी सनाउल हक़) से अपनी मुलाकात का जिक्र करते हुए बताते हैं कि उसने अपनी किताब उन्हें भेंट की जो अभी भी उनके पास है।

काफिर खात्मे के साथ-साथ सना का लक्ष्य था कि कितनी जल्दी डेमोक्रेसी ख़त्म हो। लोकतंत्र का अंत हर आतंकी सोच का लक्ष्य होता है। वह कहता था कि डेमोक्रेसी ईविल है, इसके चारों खम्भों को तोड़ना जरूरी है। इस काम में यह आख़िरी सांस तक लगा रहा। मजहबी दहशतगर्दी और गैर-मजहबी दहशतगर्दी को क्या एक तराजू पर तौला जा सकता है। अवश्य नहीं। यह विचारधाराई दहशतगर्दी है। जिसमें कई शताब्दियों की चेतना और अवचेतना काम करती है। इसमें संस्थान-बद्धता भी होती है। इससे साफ़-साफ़ और दोटूक होकर भिड़ना चाहिए। नहीं तो सनाउल हक़ भले मरे, उसकी सोच और उसे ईंधन देने वाली मानसिक व्यवस्था नहीं ख़त्म होने वाली।

यह मानसिक व्यवस्था बनाने में दारुल उलूम देवबंद जैसे इदारों की क्या कोई भूमिका नहीं है! दारुल उलूम देवबंद को अपनी समीक्षा करनी चाहिए। लेकिन ऐसा करने के बजाय वह एक चालाक कोशिश करते दिखता है। सना के सम्बन्ध में कौन सी चालाक कोशिश? यही कि सना के घर वाले उसे दारुल उलूम से स्नातक बताते हैं जबकि दारुल उलूम इससे इंकार करता है। दारुल उलूम कहता है कि उसके यहां किसी भी रिकार्ड में सनाउल हक़ नहीं है। यही पल्ला झाड़ना है। ऐसा ही दूसरे मौकों पर भी करता है। जैसे नुसरत जहां वाले केस में देखिये। पहले वहीं का एक मौलाना नुसरत पर फतवा देता है और फिर जब मीडिया में बात उछलती है तो वहीं का कोई दूसरा मौलाना कहता है कि इससे उनका कोई वास्ता नहीं, उस मौलाना की वह निजी राय होगी।

कुछ महीने पहले 'द वायर' पर नेता और इस्लामी अध्येता आरिफ मोहम्मद खान और पत्रकार आरिफा खानम शेरवानी की बातचीत पेश हुई थी। इस बातचीत में आरिफ मोहम्मद खान, जो फिलवक्त केरल के राज्यपाल हैं, दारुल उलूम देवबंद के बारे में बताते हैं कि वह किस तरह मुस्लिम तालिबे-इल्म में दूसरे मजहबों से दूरी, घृणा, आक्रामकता और अपनी दीनी श्रेष्ठता सिखाते हैं जो हर विद्यार्थी में गलत मानसिक व्यवस्था बनाती है। खान साहब की चिंता यह भी है कि इसी तालीम से पढ़े देवबंदी मौलानों की अक्सरियत मस्जिदों के मिंबरों पर काबिज है। जाहिर है, गलत और हानिकारक मानसिक सोच इस तरह फैल रही है।

इन बातों के मद्देनजर क्या दारुल उलूम देवबंद को चेतना नहीं चाहिए? अपनी पढ़ाई-लिखाई पर विचार नहीं करना चाहिए? इस तरह की कट्टर सोच निरंतर आगे बढ़ती रही तो क्या वह दूसरे मजहबों में कट्टरता की सोच का तर्क नहीं पैदा करेगी? दारुल उलूम देवबंद को डेढ़ सौ साल से अधिक हुए तालीम का ठिकाना बने हुए, जिसका इतिहास मुस्लिम लीग और आरएसएस से भी पुराना है, क्या उसे अपनी इदाराई भूमिका की आत्मसमीक्षा नहीं करनी चाहिए? स्पष्ट है कि किसी चालाक कोशिश से, या अपना पल्ला झाड़ने से, यह मुमकिन नहीं। नहीं तो मजहबी कट्टरता, और कट्टरता की मजहबी जुगलबंदी, को बल मिलता रहेगा। इससे आधुनिकता, लोकतंत्र और सामाजिक सौहार्द को खतरा लगातार पहुंचता रहेगा।

-- अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी

(तस्वीर प्रवीण खन्ना की खींची है जिसमें स्क्रीन पर आसिम उमर है और कुर्सी पर बैठे, बात करते हुए, उसका भाई रिज़वान हैं।)

शुक्रवार, 10 मई 2019

लोकगीत का महत्व मोहनजोदड़ो से कहीं अधिक है : हजारीप्रसाद द्विवेदी

ग्राम गीत का समस्त महत्व उसके काव्य-सौंदर्य तक ही सीमित नहीं है. इनका एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य है एक विशाल सभ्यता का उद्घाटन जो अब तक या तो विस्मृति के गर्भ में डूबी हुई है या गलत समझ ली गई है.

आर्य आगमन के पूर्व ही समृद्ध आर्येतर सभ्यता भारतवर्ष में फैली हुई थी. उसके साथ ही और भी छोटी-छोटी सभ्यताएं इस विशाल भूभाग में फैली हुई थीं. आर्यों ने राजनीतिक रूप में तो भारतवर्ष को जीत लिया था पर वे सांस्कृतिक रूप में पूर्ण रूप से यहां के मूल निवासियों के द्वारा प्रभावित हो गए थे.

यहां की मूल सभ्यता वैदिक सभ्यता से एकदम भिन्न थी और आज भी लोकाचार स्त्री-आधार-पौराणिक परंपरा आदि के रूप में वह विद्यमान है. ग्राम गीत इस सभ्यता के वेद हैं. वेद भी तो अपने आरंभिक युग में श्रुति कहलाते थे. वेद भी आर्यों की महान जाति के गीत ही थे और ग्राम गीतों की भाँति ही सुनकर याद किए जाते थे.

सौभाग्यवश वेद ने श्रुति से उतरकर लिपि का रूप धारण कर लिया पर हमारे ग्राम गीत अब भी श्रुति ही कहलाते हैं. …लोकगीत का महत्व मोहनजोदड़ो से कहीं अधिक है. मोहनजोदड़ो सरीखे भग्न स्तूप ग्राम गीतों के भाष्य का काम दे सकते हैं.

(स्रोत – हिन्दी साहित्य की भूमिका)

[ Lokgeet ka mahatwa, Lokgeet kya hai, lokgeet par hazariprasad dwivedi ka mat, hazariprasad dwivedi ki lokdrishti, Hazariprasad dwivedi ka lokmat, lok sahitya ka mahatwa ]

शनिवार, 22 सितंबर 2018

फिल्म मंटो : सच के लिए लड़ते एक लेखक की काबिले-गौर कहानी

‘मंटो’ बायोपिक फिल्म की बहुत समय से प्रतीक्षा कर रहा था। समय-समय पर आने वाले ट्रेलर या वीडियो के टुकड़े इंतिजार को अ-धीरज में बदल रहे थे। आज वह दिन हाथ लग ही गया। कुछ रचनाकार होते हैं जिनके लेखन के साथ-साथ उनके जीवन का भी आकर्षण किसी को खींच सकता है। यह व्यक्तिगत रुचि का मसला हो सकता है। मेरे लिए तुलसी, कबीर, ग़ालिब, निराला, मंटो जैसे रचनाकार लेखन के साथ-साथ अपने जीवन का भी आकर्षण रखते हैं। उनके लेखन से गुजरने की तरह उनके जीवन से गुजरना भी अच्छा लगता है। इसलिए यह फिल्म आते ही आज इसे देखने से खुद को न रोक सका और देखने के बाद एक काबिले-तारीफ फिल्म को देखने की खुशी हुई।

यह फिल्म मंटो की उस मूल-वस्तु की मार्मिक प्रस्तुति है जहाँ सच अकेला लड़ता है। झूठ के महाजाल में उलझे हुए, उससे लड़ते हुए, मंटो को पूरी फिल्म में देखा जा सकता है। यह झूठ का प्रपंच सत्ता का है, संस्थाओं का है, समाज का है, व्यक्ति का है, साहित्यकारों का है, साहित्यिक मानदंडों का है और उनसे लड़ने वाला मंटो एक ईमानदार लेखक की तरह अकेला दिखता है। लेकिन एक विश्वास उसमें है जो उसे निडर किये रहता है। यह सर्जक का विश्वास है। निजी जमीर का विश्वास है। यह जमीर पूरी तरह से एक कलाकार का जमीर है। कलाकार जो ‘अपने जमीर की मस्जिद का इमाम किसी दूसरे को नहीं’ बना सकता। वह अपने सच के साथ जूझ मरेगा, उसे यह गवारा है।

वह मंटो जब स्त्री-दुनिया का सच लिखता है तो लोगों से पचता नहीं। जबकि वह कटु सच्चाई है। जब वह विभाजन का बेबाक सच लिखता है तो वह भी नागवार गुजरता है। साहित्यकारों के लिए वह ‘गुड़ घारी हँसिया’ है जिसे वे न लील पा रहे, न उगल पा रहे। इधर मंटो डंके की चोट पर कहता है कि ‘ये अफसाने इस दुनिया की सच्चाई हैं। अगर आप इन्हें नहीं बर्दाश्त कर पा रहे तो यह दुनिया ही नाकाबिले-बर्दाश्त है!’ मुझे कुँवर नारायण (Kunwar Narain) की ‘बिजूका’ कविता की पंक्तियां यह फिल्म देखते हुए याद आ रही थीं। पूरी कविता आप देखें –

“बोलो – ज़रा ज़ोर से बोलो
ताकि वे भी सुन सकें
जो ज़रा ऊँचा सुनते हैं

डरो मत
अगर तुम सच कह रहे हो
तो तुम आफ़त नहीं
एक सच्ची ताक़त हो।

जानता हूँ ज़ोर से बोलोगे
तो असभ्य माने जाओगे

यह हक़ सिर्फ़ झूठ को है
कि वह ज़ोर से बोले
और विशिष्ट बना रहे।

यह फुसफुसाकर धीरे बोलने वाली सभ्यता
बेहद फुसफुसी है।

कौओं का अड्डा है
यह बिजूका!”

‘मंटो’ देखते हुए ‘बिजूका’ (प्रपंच) पर मंडराने वाले अड्डा जमाए एक से एक कौओं को देख सकेंगे। इनमें वे ही नहीं है जिन्हें खल और कसूरवार कहा जाता है, बल्कि वे भी हैं जो समझदार कहे जाते हैं। बिजूका की संस्कृति में फुसफुसाकर बोलने वाले इन मौकापरस्त समझदारों का कम योगदान नहीं है।

Manto with wife Safia (left), sister-in-law Zakia Hamid Jala
फुसफुसाकर बोलने वाली मौकापस्त ‘प्रगतिशीलता’ की हकीकत ‘मंटों’ फिल्म में उजागर हुई है। आजादी और भारत-विभाजन के बाद मंटो पाकिस्तान चले गये लेकिन उनके आइने में दोनों देशों की हकीकत चीखती है। चाहे भारत के तरक्कीपसंद हों, चाहे पाकिस्तान के तरक्कीपसंद हों, उन्हें मंटो नहीं पच रहे। बंबई का तरक्कीपसंद लेखक भी उनको लेकर सहज नहीं है। पाकिस्तान में फैज अहमद फैज जैसा प्रगतिशील भी उन्हें साहित्यिक विशिष्टता के बरअक्स कम-साहित्यिक पा रहा है। वह भी अदालत में! जहाँ तेज-तर्रार होकर सत्ता के खिलाफ और साहित्यकार के साथ आना है, वहाँ किन्तु-परन्तु के साथ हाजिर हैं कर्नल फैज अहमद फैज। इस पर मंटो का यह कहना उनके बेकाक स्वभाव, और फैज के मूल्यांकन, का प्रमाण है कि ‘बेहतर होता कि फैज अहमद फैज भी मुझे फह्हाश (अश्लील) लिखने वाला बोल देते।’

फिल्म के लिए निर्देशक ने जो विषय-वस्तु उठायी है वह बीती, बीसवीं, सदी की है। विगत से हम जो भी व्यक्ति-घटना-वस्तु-संदर्भ लाते हैं, उसकी एक ‘रचना’ कर रहे होते हैं। इस अर्थ में फिल्म मंटो एक रचना है। इस रचना में लाजमी तौर पर अपने वर्तमान के सवालों की मौजूदगी होती है। ऐसा मंटो में भी है। लेकिन यह मौजूदगी सहज संभव हुई है। आज का कोई संदर्भ चस्पा करके नहीं। प्रासंगिकता इससे और सघन होती है। यों भी एक ईमानदार जीवन कब प्रासंगिक नहीं होता! हर युग में यह जीवन जीना चुनौती बना होता है। मंटो होना तब ही कठिन नहीं था, आज भी कठिन है और आगे भी रहेगा।

इस फिल्म में जो सवाल आपको मथते हैं वे आज भी हमारे सामने हैं। ‘पहचान’ का सवाल आज भी उतना ही उग्र है। ‘राष्ट्रीयता’ के सोच की भयंकर सीमाएँ हमारे वर्तमान की जिंदगी का भी सच हैं। सांप्रदायिकता का जहर क्या भारत विभाजन के बाद खत्म हो गया! धर्मांधता की समस्या किस कदर कहर ढा रही, प्रतिदिन का हमारा जीवन इसका गवाह है। ‘अभिव्यक्ति की आजादी’, जिसे मंटो मुकदमे-दर-मुकदमे झेल रहे थे, वह आज भी संकट में है। एक फिल्म-रचना के रूप में यह फिल्म नित-नवीन है। अगर वर्तमान की समस्याओं से आप ऊँघे हैं, तो यह फिल्म आपको झकझोरती है।

निर्देशक ने बड़ी कुशलता से अभिव्यक्ति के प्रति ईमानदार एक रचनाकार की त्रासदी और पूरे समाज की त्रासदी को एक दूसरे में मिला दिया है। जोकि मिली है भी। इसे अलग-अलग देख पाना संभव नहीं है। सिस्टम से लड़ते हुए व्यक्ति के रूप में निराश-हताश और जर्जर हो रहे मंटो के निजी दुख का कौन सा सिरा है जो सामाजिक विडंबना से नहीं मिला है! इस दुख के सागर में पूरे समाज की विकृत चेहरा डूब-उतिरा रहा है। परिवार के बीच में मंटो का दुख देखें या श्याम की मित्रता के संबंध में मंटो का दुख देखें; समाज के घटिया मूल्य और मान्यताएँ कहाँ नहीं बेड़ा गर्क कर रहीं!
  
Manto with his friend Shyam from film Manto
मार्मिक स्थलों को इस फिल्म में महत्व दिया गया है, या कहें कि उन्हें सिनेमाई सघनता दी गयी है। जैसे, ‘आइडेंटिटी’ के सवाल को फिल्म में सिनेमायित होते देखते हैं। समाज में ‘पहचान’ का संकट कितने सूक्षम स्तर पर काम करता है, समस्या पैदा करता है, इसे बताने के लिए मंटो और श्याम की दोस्ती पर्याप्त है। मंटो बंबई नहीं छोड़ने वाले थे। उनकी मां, पिता और बेटा वही दफ़्न हैं। उन्हें बंबई से गहरा लगाव है जिसे जीवन भर नहीं भूल पाते। लेकिन क्या हुआ कि उन्हें बंबई छोड़ना पड़ा। जब अपने प्यारे कलाकार दोस्त श्याम ने भी उनकी पहचान एक मुसलमान ही के रूप में की तब वे टूट गये। भले उसने रोष में बात कही हो। किन्तु यह बात दूसरे कलाकार को तोड़ गयी। ‘मारने भर को तो मुसलमान हूँ ना!’ यह बात एक गहरी चोट और कचोट देती है। यह कील जितनी दोस्ती में गड़ी है, उतनी ही समाज में भी।

सधे हुए संवादों को रखने के मामले में भी यह फिल्म उत्कृष्ट साबित हुई है। वे संवाद क्लासिक हैं ही जिन्हें मंटो के लेखन से लिया गया है। उनकी चमक हमारी आज की रोजमर्रा की जिंदगी में भी फीकी नहीं। ये संवाद जितने ‘बोलते’ हैं उतने ही सोचने के लिए कुरेदने वाले भी हैं। ये संवाद इंसान के पाखंड को बेपर्द करते हैं और पाखंड हर दिशा में फैला है, इसलिए हर तरफ़ सही साबित होते दिखायी देते हैं। जैसे एक संवाद है, जिसमे जन-रुचि के ठेकेदार बनने वाले से मंटो मुखातिब होते हैं - ‘तुम हरगिज यह नहीं तय कर सकते कि इसे पढ़ कर लोग कैसा महसूस करेंगे।’ आज देखिये तो जन-रुचि के ठेकेदारों का यह बड़ा प्रिय तर्क है कि लोग यह सोचेंगे, लोगों की भावना इस तरह आहत होगी, आदि। इसी तर्क से वे कभी किसी रचना या फिल्म पर लोगों से बवाल खड़ा करवाते हैं तो कभी किसी खास तरह की रचना या फिल्म के ‘ढर्रे’ को मजबूती से जनता के ऊपर थोपते जाते हैं। न सोच में नयापन आ पाता है, न ही कला में। जनता यही देखती है या इसी के साथ अच्छा महसूस करती है या यही जनता की माँग है, ऐसा कह कर फिल्मिस्तान ने वाहियात फिल्मों का ढर्रा लंबे समय तक जारी रखते हुए जनता से जो कमाही की और यह ट्रेंड थोड़ी टूट-फूट के बावजूद जारी है, स्वयं में इस बात का गवाह है। प्रयोग और नये-पन को हतोत्साहित करता ‘ट्रेंड’। ‘मंटो’ फिल्म रूढ़ फिल्मिस्तानी ढर्रों पर भी चोट करती है।

फिल्म के एक सीन में नवाजुद्दीन
नंदिता दास को इस बेहतरीन फिल्म को निर्देशित करने के लिए बहुत-बहुत बधाई! नवाजुद्दीन में अभिनय की जो ‘रेंज’ है, वह इस फिल्म में भी बखूबी देखी जा सकती है। मंटो के किरदार को बहुत कायदे से उन्होंने उतारा है। पूरा साध लिया है। गजब का ‘परफेक्शन’ लिए हुए। पर्दे पर जो देश-काल दिखाया गया है, वह मंटो के समय को प्रत्यक्ष करने में समर्थ हुआ है। फिल्म में बंबई और लाहौर दोनों को देखना दिलचस्प है। सबका नाम नहीं ले सकता लेकिन लगभग सारे अभिनय करने वालों ने बहुत सफाई से किरदार निभाया है। मुझे कहीं कोई चूक नहीं दिखी। अंततः मैं यह जरूर कहूँगा कि आप भी इसे देख आइए। जरूरी फिल्म है।

नोट : मैं कोई फिल्म समीक्षक नहीं हूँ। फिल्म देखते हुए मुझे जैसा महसूस हुआ और जैसी मेरी तुरंता प्रतिक्रिया हुई, उसे मैंने शब्दबद्ध कर दिया है। ~ अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी / 22-09-2018

गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

जीता रहे यह साहस!

तीन-चार दिन पहले पाकिस्तान के जाने माने पत्रकार हामिद मीर पर हुए जानलेवा हमले की खबर मैंने सुनी। इस समय थोड़ा सुकून इस बात का है कि उन पर हुए प्राणघातक हमले के बाद भी उनकी जान सुरक्षित है और खुद पर हुए इस हमले को बहादुराना ढंग से जीतते हुए वे पुनः ऊर्जावान होंगे; इससे एक किस्म की आश्वस्ति या ढ़ाँढस भी मन में है। उस कार चलाने वाले ड्राइवर का शुक्रगुजार होना होगा जिसने हामिद साहब को बचाने के लिए कार की ड्राइविंग ऐसी की कि गोलियाँ सटीक प्राणघातक स्थलों से अलग जा लगीं। उम्मीद है कि आँत में लगी इन गोलियों से हुई क्षति की भरपाई के बाद पाकिस्तानी जियो-न्यूज के संपादक हामिद मीर पूर्ववत सक्रिय होंगे। आमीन! 

अजीब इत्तेफाक है हामिद मीर से परिचित होने का! मैं जगन्नाथ आजाद की शायरी खोज रहा था यू-ट्यूब पर, तभी एक किनारे की तरफ मैने देखा कि प्रस्तावित वीडियो प्रस्तुतियों में एक ऐसी है जिसमें पाकिस्तान के पहले कौमी तराने के ताल्लुक किन्हीं हामिद मीर की तकरीर है। क्लिक करके मैंने पूरी प्रस्तुति देखी, और जिस पहली चीज ने मन पर गहरा प्रभाव डाला वह यह थी कि पाकिस्तान में तकलीफों की बगैर परवाह किए सच बोलने वालों का जुनून क्या खूब है! इस प्रस्तुति में हामिद मीर एक तरफ थे और दूसरी तरफ वह भीड़ थी जो यह सच मानने के लिए तैयार नहीं थी कि पाकिस्तान का पहला कौमी तराना  कोई जगन्नाथ आजाद लिख सकता है। एक ओर हामिद मीर थे दूसरी ओर राष्ट्रवाद, जो कि प्रायः बदमाशों का झूठ हुआ करता है। सरहद के उस पार हो या इस पार। 

और इस तरह दोस्ती हुई एक दिलेर पत्रकार से। आगे फिर हामिद मीर की कई प्रस्तुतियों को सुनता और सराहता रहा। धीरे धीरे पाकिस्तान के ऐसे कई पत्रकारों को मैंने जाना जो संकट की खांईं में भी सच बोलने के लिए प्रतिबद्ध हैं, बगैर इस बात की चिन्ता किए कि इसकी क्या कीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी। ऐसे पत्रकारों से परिचित होना पाकिस्तान के बारे में इस गलत राय को दुरुस्त करता है कि वहाँ मुल्लाइयत/तालिबानियत का ही राज है और उसके खिलाफ बोलने वाला कोई नहीं। सच तो यह है कि वहाँ के बहुत से पत्रकार जीवन की बाजी लगाकर मजहबी रूढियों का विरोध कर रहे हैं और शिकार हो रहे हैं। इसी का प्रमाण है कि वर्ष २०१३ में पाँच पत्रकार और वर्ष १९९० के बाद अब तक पचास से अधिक महत्वपूर्ण पत्रकार शहीद हो चुके हैं। क्या भारत में पाकिस्तान की एक रूढ़ छवि बनाए हुए लोग पाकिस्तान की इस समृद्ध प्रतिरोधी धारा, जिसे अपने जान-माल की कोई परवाह नहीं है, का सम्मान कर सकेंगे। यदि हाँ, तो वे पाकिस्तान को किसी स्टीरियो टाइप इमेज से अलग देख सकेंगे और भारतीय पत्रकारिता के लिए साहस के एक प्रेरणा-स्रोत को देख सकेंगे। इस दृष्टि से सरकार के सत्ता में आने की संभावना देख कर कभी कांग्रेसी तो कभी भाजपाई हो जाने वाली हमारी मौका-परस्त हिन्दुस्तानी मीडिया इन पाकिस्तानी पत्रकारों से कुछ रीढ़-सा पा सके तो यह कम बड़ी बात नहीं होगी। 

खतरों से खौफ न खाने वाले पत्रकार हामिद मीर पर यह कोई पहला कायराना कट्टर-पंथी हमला नहीं है। कुछ ही साल पहले उनकी कार में तालिबानियों ने बम फिट कर दिया था, जिसे संयोगवश देख कर निष्क्रिय कर दिया गया। लेकिन ऐसी घटनाओं के बावजूद, तब से लेकर अब तक हामिद मीर सच को निर्भीक ढंग से रखते हुए तालिबानियों और तालिबानियत-पसंद हुकूमती शक्तियों की आँख की किरकिरी बने हुए हैं। गौर-तलब है कि इस हमले के होने के पहले हामिद मीर ने यह बात कह दी थी कि उन पर हमला होगा और उस हमले की जिम्मेदार आई.एस.आई. होगी। इस बात का उल्लेख उनके परिवार के लोग और जियो-न्यूज के प्रेसीडेंट इमरान असलम भी करते आ रहे हैं। इन बातों के मद्देनजर मौजूदा सरकार की काबिलियत और सामर्थ्य का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह आई.एस.आई पर कुछ नहीं बोल पा रही उल्टे पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय की तरफ से इसकी कड़ी प्रतिक्रिया आई है और चैनल का लाइसेंस रद्द करने की सिफारिस की गई है। इससे पहले भी आई.एस.आई. की तरफ से अपने ऊपर हमले की स्थितियों/संभावनाओं को लेकर वहाँ के कई और विद्वानों-पत्रकारों ने ऐसी बातें कही हैं। चाहे वह आसमां जहाँगीर हों या मारवी सिरमद। या नजम सेठी। पर क्या नवाज सरकार में इतनी कुव्वत है कि वह आई.एस.आई. से लोहा ले सके। बिल्कुल नहीं। और ऐसी स्थिति में पाकिस्तान से तमाम यातनाएँ सहने के बाद अब कनाडा में रह रहे पत्रकार तारेक फतेह का यह कहना सही है कि ‘या तो आप पाकिस्तानी सेना-आई.एस.आई. को बचा लें या फिर पाकिस्तान को! दोनों एक साथ नहीं बच पाएँगे।’ जाहिर सी बात है कि इन कठिन स्थितियों में जो पत्रकार वहाँ रह कर सच बोलने का साहस कर रहे हैं, वे तलवार की धार पर चलने जैसा कठिन काम कर रहे हैं। 

फिलहाल, हम हामिद मीर की सलामती की दुआ करते हैं। पाकिस्तान के वर्तमान माहौल में हामिद मीर जैसे पत्रकारों का सक्रिय और बुलंद रहना वहाँ की तमाम उपेक्षित और शोषित तबकों की आवा्जों को मजबूत करना है जो अपने हक के लिए जूझ रही हैं और जो ऐसे पत्रकारों के अभाव में बे-आसरा हो जाएँगी। हामिद मीर का रहना पत्रकारिता के उस साहस का जिन्दा रहना है जो बलोचिस्तान के साथ न्याय की गुहार करते हुए सीने में गोलियाँ खाने के लिए तैयार है, जो ‘नाइन इलेवन’ के बाद ओसामा का साक्षात्कार लेने से पीछे नहीं हटता, जो मलाला यूसुफजई के हक में आवाज बुलंद करने से नहीं कतराता जबकि उस समय तमाम पत्रकार तालिबानी धमकी के सामने डरे हुए मलाला को अमेरिकी/अंग्रेजी एजेंट बोल रहे हों! जीते रहें हामिद मीर और जीता रहे उनके संपादन में जारी जियो-न्यूज! जागे पाकिस्तानी आवाम और इस साहस से प्रेरणा ले हिन्दुस्तानी मीडिया! विकराल रात में इन चिरागों की बड़ी अहमियत है:

“इसी खंडहर में कहीं कुछ दिये हैं टूटे हुए,
इन्हीं से काम चलाओ बड़ी उदास है रात!”(फिराक़)
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अपडेट: इस आलेख का जिक्र ‘हिन्दुस्तान’ और ‘जनसत्ता’ दोनों अखबारों में हुआ था। दोनों का आभार!

हिन्दुस्तान में  २९-अप्रैल’२०१४ को:

जनसत्ता में ५ मई-२०१४ को: