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मंगलवार, 18 मार्च 2014

चचा ग़ालिब (४) : मेरी दृष्टि में__शमशेर

कल होली थी, तो सोचा यही फोटो साँट दूँ, शमशेर होली के रंग में, फोटो: यहाँ से
[तकरीबन दो साल पहले मैंने ‘चचा ग़ालिब’ श्रृंखला के अंतर्गत तीन पोस्टें लिखी थीं। आज एक लंबे अंतराल के बाद इसी सिलसिले को बढ़ाते हुए यह चौथी प्रस्तुति है। अस्त-व्यस्त जीवन, ठौरे-ठिकाने से दूरी और तितर-बितर मन के चलते कुछ प्रस्तुत कर पाने/सकने का यह सुयोग बहुत विलंब से बन रहा है। कुछ ड्राफ्ट अभी आधे-अधूरे लिखे हुये हैं, उन्हें मौका पाकर प्रस्तुति-योग्य रूप देकर प्रस्तुत करता रहूँगा; जैसी ‘बतकही’ की प्रकृति है - ‘कुछ औरों की कुछ अपनी’, उसी के अनुरूप। आज चौथी प्रस्तुति के रूप में शमशेर बहादुर सिंह द्वारा लिखा यह लघु आलेख प्रस्तुत है, ‘ग़ालिब: मेरी दृष्टि में’।: संपादक] 

“ग़ालिब: मेरी दृष्टि में”__शमशेर

ग़ालिब खुद एक बड़ा हीरो है अपनी व्यापकता के केन्द्र में, जो कि स्पष्ट एक आधुनिक चीज है। व्यक्ति का निर्बाध अपनापन। हर बात में अपने व्यक्तित्व को – अपने निजी दृष्टिकोण को - सामने रखना। मैं खुद किस पहलू से सोचता हूँ, किस ढंग से महसूस करता हूँ, यह उसके लिए महत्व की बात है। 

हर बात की तह में जाने की – विशिष्ट तौर पर उसका मर्म समझने की – उसकी कोशिश सर्वत्र प्रकट है।

उसकी मुसीबतें, उसका संघर्ष, जिसको वह कभी छिपाता नहीं… उसके शब्दों में हू-ब-हू आधुनिक सा लगता है। अजब बात है। उसमें आज के, आधुनिक साहित्यकार की-सी पूरी तड़प और वेदना के बीच, एक तटस्थ यथार्थवादी दृष्टि है। उसका यथार्थवाद निर्मम है। मुक्तिबोध और निराला, अपने भिन्न संस्कारों के अस्त-व्यस्त परिवेश में, उसको कुछ-न-कुछ प्रतिबिंबित करते हैं। निराला का यह प्रिय शेर था:

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।

क्या ताज्जुब है जो उसके युग ने उसको नहीं पहचाना।

अगलों के काव्य-शिल्प को वह अंदर से ग्रहण करता है: उस शिल्प की आंतरिक, प्रातिभ, योजना को मात्र शब्दों और मुहावरों को, उसके प्रयोग की रीतियों को, उन उस्तादों के जीवंत प्रयोगों से ग्रहण करता था, अपने खास तेवर के साथ।

लोगों ने सही कहा है कि जो शख्स एक अर्से से अंग्रेजी अलमदारी और कानून-व्यवस्था और नीतियों को निकट से और विचारपूर्ण दृष्टि से देखता आ रहा हो, जो कलकत्ते के वातावरण को भी अच्छी खासी तरह सूँघ आया हो, वह जीविका के लिए मुग़ल दरबार से बँधा रहकर भी, अपनी चेतना में पिछले युग से जुड़ा हुआ नहीं रह सकता। इस अर्थ में ग़ालिब अपने युग में अकेला था। 

वह कसीदे वह कसीदे लिखता है तो अपने आश्रयदाताओं की प्रशस्ति – जो कसीदे का बहरहाल आवश्यक अंग है – उसका मुख्य उद्देश्य नहीं होती। बल्कि अपनी प्रतिभा का ओज, काव्यकला पर अपना पूर्ण अधिकार, अर्थात्‍ कसीदे की विधा का सांगोपांग पूर्ण स्वरूप प्रस्तुत करना – अपने समकालीनों को दिखाना: यह होता था उसका काव्यात्मक उद्देश्य। 

कुछ जैसे निराला को रवीन्द्रनाथ से होड़-सी रही, ग़ालिब भी पूर्ववर्ती उस्तादों की श्रेणी में सगर्व अपने को रखता था।

कभी-कभी क्या, अक्सर ऐसा लगता है कि वह समाज में, अपने जीवन में, प्रायः हर ओर विरोधाभास देखता है। हर चीज एक विडंबना का भाव लिए हुए होती है। हर वस्तु प्रश्न से चिह्नित। हर बात जो सही सोची जाती है, वह उल्टी निकलती है। …ग़ालिब जैसे खरे और सच्चे लोगों के लिए क्या यही नियति है? ईमानदारी का कोई मतलब नहीं? सौंदर्य और प्रेम का भी अंत क्या? सारी व्यवस्थाएँ एक तमाशा जैसी हैं। रीति-नीति, आचार, दर्शन-दृष्टि, लौकिक संबंध … सब।

शायद एक चीज जो स्थायी है वह कला है – और वह ग़ालिब के लिए ग़ालिब की अपनी कला। इस कला में* मर्म में स्थित कवि पूर्णतया आश्वस्त निर्द्वंद्व और अमर-सा दिखता है। कम-से-कम स्वयं को, अपनी दृष्टि में। …और बहुत बाद में हमको भी वह वैसा ही दिखता है। 

ग़ालिब का सूफी भाव सूफियों की परंपरा से एकदम भिन्न और मात्र उसका एकदम अपना ही मालूम होता है। अगर ग़ालिब के सूफी भाव की स्थिति का विश्लेषण किया जाय तो वह शायराना रिवायत कतई न होते हुए भी, कहीं अनीश्वरवादी और कुछ-कुछ अस्तित्ववादी सूफीवाद निकलेगा!! यह पारिभाषिकता आधुनिक है। 

अपनी कला पर ग़ालिब का कितना दृढ़ विश्वास है। अपने सर्वोपरि होने से उसे किंचित भी संदेह नहीं। देखिये, उसका सेहरा देखिये। उसकी फारसी ग़ज़ल, जिसमें उसने भविष्यवाणी की है कि आगामी युगों में ही उसकी सही पहचान हो सकेगी, हालाँकि तब बहुत से मूर्ख भी उसको समझने-समझाने का दावा करेंगे। अपने समकालीन विद्वान मौलाना आजुर्दा को वह तमककर कहता है – अगलों के गुणगान करते तुम नहीं थकते, मगर तुम्हारी आँखों के सामने जो महाकवि बैठा अपनी रचना सुना रहा है, उसको पहचानने की शक्ति नहीं रखते, कितने आश्चर्य की बात है!

मुझे ऐसा लगता है कि ग़ालिब की दिलचस्पी किसी प्रकार के आदर्शवाद में नहीं थी। थी तो केवल इंसान में। उसके विडंबनापूर्ण मगर हौसलेमंद जीवंत नाटक में। और इसलिए कि आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्साँ होना! वह स्वयं कितना बड़ा इंसान था, हाली के मार्मिक शब्द इसकी पुष्टि करते हैं।

इतनी निर्भीकता से अपनी और परिवेश की यथार्थ स्थिति को स्पष्ट, ज्यों-का-त्यों रखने वाला गद्यकार उर्दू में आगे फिर नहीं हुआ। और उसके सबके यहाँ तकल्लुफ़ात के पर्दे हैं। एक केवल इसके यहाँ नहीं। उसके पत्र इसका सबूत हैं। 

यह कम कौतुक की बात नहीं कि हिंदी-संसार में ग़ालिब के लिए अलग ही ख़ाना है और शेष उर्दू के लिए अलग। जहाँ उर्दू से बिलगाव की भावना है, ग़ालिब से नहीं। इतने दुरूह कवि होते हुए भी ग़ालिब हिन्दी पाठकों के अपने हो गये। ऐसा क्यों है; इसका जवाब देना आसान नहीं है।

संदर्भ:
तु अय्‌ कि मह्‌वे-सुख़नगुस्तराने-पेशीनी
मबाश मुन्किरे ‘ग़ालिब’ कि दर ज़्मानए तुस्त।

साभार: पुस्तक - “कुछ और गद्य रचनाएँ”_शमशेर बहादुर सिंह / राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

चचा ग़ालिब (३) : काग़जी है पैरहन

मिर्ज़ा ग़ालिब के निम्नलिखित दो शेर दीवाने-ग़ालिब की पहली ग़ज़ल के आरंभिक दो शेर हैं. इनका अर्थ मुझसे शब्दार्थ देखकर नहीं बन पाता था, लेकिन उग्र जी की टीका से इन्हें समझना आसान हुआ. इन दोनों ही शेर को समझने के लिए फ़ारसी सन्दर्भों तक जाना पड़ता है. उग्र जी ने उन सन्दर्भों से टीका के दौरान अवगत कराया है, दोनों शेर का मतलब उन्हीं के शब्दों  में हू-ब-हू प्रस्तुत है(संभव हो कुछ मित्रों को भी आसानी हो): 

नक़्शे-फ़रियादी है किसकी शोख़ि-ए-तहरीर का,
काग़जी है पैरहन हर पैकरे-तस्वीर का.

मतलब: '' सृष्टि की प्रत्येक रूप-रेखा में किसने अपनी अद्भुत-लिखावट से वह बाँकपन भर दी है जिससे व्यग्र हर चित्र काग़जी-चोले में फ़रियादी बना हुआ है? (पुराने ज़माने में, ईरान में, फ़रियादी शाह के सामने काग़ज का पहरन पहनकर जाने थे; जिस पर फ़रियाद लिखी हुई होती थी. काग़जी-पैरहन से मतलब श्रृष्टि के क्षणभंगुर-विन्यास से है. काग़ज पर सुरक्षित चित्र जैसे सहज नाशवान होता है, वैसे ही, यहाँ जो भी है, क्षणभंगुर है. सो, हरेक की मूर्ती क्या है, अपनी-अपनी क्षणभंगुरता की फ़रियाद है -- विश्व-नियंता के दरबार में.) '' 


कावे-कावे सख़्त-जानीहा-ए-तनहाई न पूछ,
सुब्ह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का.

मतलब: '' वियोग और विवशता से पथराए-प्राण जो प्रचंड पीड़ा पा रहे हैं उसकी कथा कुरेद-कुरेदकर मत पूछ. उनका अंत कहीं नजर ही नहीं आ रहा है. वियोग की रात्रि का प्रभात करना वैसा ही कठिन काम हो रहा है जैसा फ़रहाद के लिए दूध की नहर तैयार करना था. ऐसे कठिन काम कदाचित सिद्ध भी हो जाएँ, तो साधक के प्राण लेकर ही सिद्ध होते हैं! 'कोहकन की मौत थी अंजाम जू-ए-शीर का.' (फ़ारस के विख्यात प्रेमी फ़रहाद की कथा थोड़े में यह है कि वह शाह ख़ुसरो की पुत्री शीरीं पर मोहित हो गया था. शाह ने फ़रहाद को वचन दिया था कि यदि वह पहाड़ काटकर दूध की नहर ला सके, तो निस्संदेह वह अपनी पुत्री का विवाह उससे कर देगा. लेकिन जब फ़रहाद ने अथक-श्रम के साथ दूध की नहर प्रायः तैयार कर ली तब किसी बुढ़िया से शीरीं के मरण का संवाद पठाकर ख़ुसरो ने छल से फ़रहाद को आत्महत्या के लिए प्रेरित किया. मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर इसी कथा की खुशबू से भरा है.) ''

बुधवार, 14 मार्च 2012

चचा ग़ालिब (२) : मैं दिल हूँ, फ़रेबे-वफ़ा-ख़ुर्दगाँ का

नकारात्मक/बदतर/अशिव/तुच्छ के प्रति दाय रखना बड़ा काम है, नामुमकिन सा! धर्मवीर भारती के 'अंधायुग' में कुछ ऐसा ही सवाल था कृष्ण से, 'आस्था तुम लेते हो, लेगा अनास्था कौन'! सिर्फ अच्छे-अच्छे तक ही अपनी पहुँच रखकर दायरा कभी बृहत्तर नहीं रखा जा सकता. ईश्वर की विराटता शिव के साथ अशिव के समावेश से पुराती है. अमृत और विष दोनों को उसने उसी निष्ठा से रचा है. मालिक मोहम्मद जायसी ने उसी ईश्वर के लिए कहा - '' कीन्हेसि अमृत , जियै जो पाए । कीन्हेसि बिक्ख, मीचु जेहि खाए ॥'' 

रचनाकार बिना इस विराट को साधे बड़ा रचनाकार नहीं हो सकता. अगर `कविरेव प्रजापतिः' है वह तब. उन धर्मग्रंथों में साहित्य भरा पडा है जहां नकारात्मक पात्रों के भी निसर्ग-सिद्ध विराट की उपेक्षा नहीं है. रावण और सुयोधन तक भी उस विराटता का छोर जाता है. ईश्वर से यह महाकाव्यात्मकता विराट मानव सीखता है. 

जयशंकर प्रसाद ने साहित्यकार के सन्दर्भ में उसे 'लघुता की   ओर  साहित्यिक दृष्टिपात' करने की बात कही है. साहित्यकार के लिए जरूरी है कि यह सहित का भाव, विराट का भाव, अपनी रचना-दृष्टि व सृष्टि में बनाए रखे. इस दृष्टि से चचा ग़ालिब की पंक्तियाँ गौर-तलब हैं: 

लबे-ख़ुश्क दर-तिश्नगी मुर्दगाँ का,
ज़ियारत-कदः हूँ, दिल आज़ुर्दगाँ का. 

मतलब, उग्र जी के शब्दों में, 'प्रेम-पिपासा में प्राण देने वाले का मैं पिपासाकुल ओष्ठ हूँ; उपासना-मंदिर हूँ मैं भाग्य-विरहित ह्रदय का.'

हमः ना-उमीदी, हमः बद-गुमानी,
मैं दिल हूँ, फ़रेबे-वफ़ा-ख़ुर्दगाँ का.

मतलब, उग्र जी के शब्दों में, 'महा-निराश, सर-से-पाँव तक संदिग्ध, मुहब्बत में छले गए, मानव का मैं महा-मोह-मण्डित-मन हूँ.' 

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

चचा ग़ालिब (१) : खायेंगे क्या?

दिल्ली की सड़कें, पेंटिंग: मुरलीधर सदाशिव जोशी
भी आदमी बदलता रहा, कभी परिवेश बदलता रहा, कभी सोच बदलता रहा, कभी दौर बदलता रहा और इन सबके बीच दिल्ली को देखने वाली निगाह भी बदलती रही। शायरों को दिल्ली ने खूब मौजियाया और तरसाया भी। मजा और सजा दोनों। दिल्ली को छोड़कर जौक कहीं और जाने के लिये राजी न थे, दिल्ली के जादू में कैद थे, ‘कौन जाए जौक, दिल्ली की गलियां छोड़कर’! जौक रमे रहे दिल्ली में। दिल छीनने में दिल्ली बेजोड़ रही, ‘दिल वली का ले लिया दिल्ली ने छीन’! लेकिन चचा ग़ालिब ने दिल्ली के एक दूसरे रुख/सिम्त को भी महसूसा और दिखाया, शायद यह दौर वह रहा हो जिसके बारे में उन्होंने पहले कहा था, ‘हर एक रोज यहां हुक्म नया होता है / कुछ समझ में ही नहीं आता कि क्या होता है’! 

चचा ग़ालिब का एक शेर इन दिनों दिलो-दिमाग पर जैसे कब्जा जमा बैठा हो। हाजिर है यह शेर और उस पर पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ का बतलाया भावार्थ: 

है अब इस मामूरे में क़हते-ग़मे-उल्फ़त, ‘असद’,
हमने यह माना कि दिल्ली में रहें, खायेंगे क्या? 

उग्र जी द्वारा बतलाया भावार्थ: “ ’असद’! अब इस जनपद में प्रेम के कष्टों की कठिन कमी हो गई है(प्राण ले लेनेवाले प्राण-प्यारे कहीं दिखाई ही नहीं देते)! हम दिल्ली में ही रहें, आपने ठीक फ़रमाया, हमने माना, हाँ। पर, प्रश्न यह है कि खायेंगे क्या? जब सुंदर लोग हों ही नहीं और अपनी ख़ूराक हो रूपमधुपान, तो ऐसे दिल्ली में रहकर क्या भाड़ झोंकें जिसमें मनमोहन चिराग़ लेकर ढूढ़ने पर भी नजर न आएँ?”