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बुधवार, 13 मार्च 2013

‘चौराहे पर पुतला’: कला के स्वधर्म और मनुष्य के बौनेपन की ‘स्ट्रांगर, लांगर और थिकर’ कहानी

[हाल ही में ‘नया ज्ञानोदय’ पत्रिका में प्रकाशित  पुरुषोत्तम अग्रवाल  की कहानी ‘चौराहे पर पुतला’ ने बहुत से सुधी पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस कहानी को पाठकों व समीक्षकों की ओर से बहुविध समझा और परखा जा रहा है। इसी समझन और परखन की प्रक्रिया में आनन्द पाण्डेय द्वारा इस कहानी की समीक्षा काबिलेगौर है। : संपादक]

‘चौराहे पर पुतला’: कला के स्वधर्म और मनुष्य के बौनेपन की ‘स्ट्रांगर, लांगर और थिकर’ कहानी 
फोटो, फ्लिकर से
  
पुरुषोत्तम अग्रवाल की लम्बी कहानी ‘चौराहे पर पुतला’ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उभार के फलस्वरूप कला और मानवता पर आसन्न फासीवादी खतरे की और धर्मनिरपेक्ष राजनीति और प्रगतिशील संस्कृति दृष्टि के पतन की कहानी है। प्रचलित विमर्शों को इस कथा-सूत्र में विलक्षण ढंग से पिरोते हुए पुरुषोत्तम अग्रवाल ने आज के समय और संस्कृति की कॉमिक-व्यंग्यात्मक समीक्षा की है।

अपने समय के भारतीय जीवन के सघन, जटिल और बहुस्तरीय यथार्थ की विविध प्रतिध्वनियों से अनुगूंजित यह कहानी महाकाव्यात्मक प्रभाव छोड़ती है। यह कहानी आज के राजनीतिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक जीवन की कॉमिक-व्यंग्यपूर्ण आलोचना है। यह -आद्यांत -सामायिक विमर्शों की हास्यास्पद; और त्रासद भी, विफलता की दास्ताँ है। यह सामयिक भारतीय जीवन की बिडम्बना को बड़े असरदार तरीके से उजागर करती है. इसका सन्दर्भ बहुत व्यापक है, बल्कि वैश्विक है।

एक शहर के समग्र जीवन की कहानी एक पुतले के माध्यम से कही गयी है। बीस साल की कालावधि में फैली इस कहानी का सारांश इसप्रकार है: बीस साल पहले नगरपालिका ने अपने आपको ‘सम्वेदनशील’ और ‘कलाप्रेमी’ सिद्ध करने के लिए नगर के सौन्दर्यीकरण का अभियान चलाया था। अभियान के तहत बड़े-बड़े कलाकारों से ‘मयूर’, ‘नर्तक-नर्तकियों’, के साथ-साथ साँवले संगमरमर से पाँच साल के खड़े-खड़े नहाते हुए बच्चे का एक नग्न पुतला भी बनवाया गया था. पुतले की भाव-भंगिमा लेखक के शब्दों में इसप्रकार थी, “पानी लोटे से गिर, पुतले के सर और शरीर से गुज़रता हुआ नाली से निकल जाता था. पुतले के चेहरे पर, मम्मी की मदद के बिना ख़ुद नहाने का आत्म-गौरव, नहाने से आ रहा ताजापन” था. ‘पुतले की यह बहुलार्थक स्नान-भंगिमा’ जिन ‘सर्जनात्मक तथा वैचारिक उपक्रमों की विषय-वस्तु’ बनी उनमें प्रमुख थी ‘अश्लीलता-संवेदी राडारों’ की सांस्कृतिक प्रतिक्रिया- ‘’कि पुतले के कारण बहू-बेटियों के चरित्र पर चिंतनीय प्रभाव पड़ रहा है.” (“अधिक सच्चे निष्कर्ष को अप्रकाशित रखने में ही बुद्धिमत्ता समझी गयी थी- पुतले के कारण बहन-बेटियों के चरित्र पर चिंतनीय प्रभाव पड़ रहा हो या न पड़ रहा हो, भाई-बापों के आत्म-विश्वास पर सोचनीय प्रभाव निःसंदेह पड़ रहा था.”) इन ‘राडारों’ ने अपनी रिपोर्ट स्थानीय ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवादी’ नेता गंगाधरजी को सौंपी. “गंगाधरजी की पार्टी तो जानी ही सांस्कृतिकता के लिए जाती थी.” ‘राजनैतिक तीर्थ-लाभ’ के मकसद से उनकी पार्टी ने पुतले को मीडिया के माध्यम से अश्लीलता फ़ैलाने वाला कहकर उसकी निंदा की और “पार्टी के पार्षदों को निर्देश भी दिया कि नगर-पालिका में पुतले को हटाने का प्रस्ताव फ़ौरन पेश कर दें”। सत्तापक्ष भी इस प्रस्ताव को पास कराना चाहता था। महापौर ने गंगाधरजी को आश्वस्त कर दिया था। लेकिन प्रस्ताव पेश होने के पहले ही मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप से महापौर वादे से मुकर गए और प्रस्ताव की कटु निंदा की। पुतले को बनाने वाला कलाकार प्रधानमंत्री का मित्र था इसलिए भी मुख्यमंत्री और महापौर प्रधानमंत्री का कोपभाजन नहीं बनना चाहते थे। गंगाधरजी कुछ नहीं कर सके क्योंकि उनकी पार्टी अल्पमत में थी। इसके बाद से यह मुद्दा धीरे-धीरे स्थानीय से राष्ट्रीय और फिर वैश्विक बन गया। सूचना और प्रसारण-क्रांति के बाद पुतले से जुड़ा विवाद सबके घरों तक में पहुँचने लगा। गंगाधरजी की पार्टी पुतले के पक्ष में खड़े होने वाले कलाकारों और बुद्धिजीवियों के साथ हिंसा और बलप्रयोग करने लगी। बात को बढ़ते देख प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री को तलब किया, पद से हटाने की धमकी दी। इशारों-इशारों में ही प्रधानमंत्री से मिले आदेश का अनुपालन करते हुए मुख्यमंत्री ने पुतला-विवाद पर एक आयोग का गठन कर दिया। अब सब कुछ आयोग की रिपोर्ट पर निर्भर था। और जैसा कि आयोगों की राजनीति होती है-बहुत अधिक समय लेना। इस आयोग ने भी कला की स्वतंत्रता, कला और राजसत्ता, कला और अश्लीलता जैसे गूढ़ प्रश्नों पर जानकारी लेने के लिए दुनियाभर के फिल्म, कला समारोहों में भागादारी की। दुनिया के सारे दर्शनीय स्थलों की यात्राएं कीं। आयोग को कई कार्य-विस्तार भी मिले।
  
पुतले से ‘सांस्कृतिक’ लोग तो परेशान थे ही लेकिन इसके साथ ही रवि सक्सेना नाम के मार्क्सवादी प्रोफेसर भी परेशान थे; निहायत व्यक्तिगत कारणों से। वे काम विकारों से ‘बीमार इंसान’ थे। वे स्ट्रांगर, लांगर और थिकर ‘अंग’ के आत्मविश्वास से वंचित थे। इसलिए उन्हें लगता था कि उनकी पत्नी जया पुतले के ‘अंग’ की कामना करती हैं और उनकी क्षमता से असंतुष्ट हैं। इससे उनके मन ने पुतले को ‘रकीब’ मान लिया और जया को चरित्रहीन। और अब वे भी पुतले के दुश्मन हो गये थे। प्रगतिशील दृष्टि की वजह से वे पुतले को हटा देने की बजाय उसे चड्ढी पहना देने के मौलिक विचार के साथ आये। आयोग की रिपोर्ट आने तक कई मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बदल गये फिर भी सत्ताधारी पार्टी वही रही, गंगाधरजी और रवि सक्सेना तो अपनी जगह पर थे ही। आयोग ने रिपोर्ट में कला की स्वायत्ता को महत्व देते हुए समाज को अश्लीलता से बचाने के लिए पुतले को चड्ढी पहनाने की सिफारिश की। कहानी पुतले के चड्ढी पहनाने के कार्यक्रम के दिन पर ही केन्द्रित है। लेकिन, फ्लैशबैक तकनीकि से पीछे की बातें भी कहती है। पुतले को जब दीवार तोड़कर मुक्त किया गया तब वह लोगों को पच्चीस साल का लगा। चड्ढी तो पाँच साल के लड़के के लिए लाई गई थी। सब लोग ‘हकबका कर चुप हो गए थे।’ कुछ ने इसके लिए कलिकाल को दोषी ठहराया तो रवि सक्सेना ने इसे पुतले की दुष्टई बताया।

यह कहानी देश की राजधानी दिल्ली से दूर राज्य के एक छोटे-से शहर में घटती है. पहली नजर में यह एक पुतले की कहानी है लेकिन थोड़ा ठहरकर देखें तो यह कहानी एक शहर में गिरते राजनीतिक-सांस्कृतिक और इसलिए मानवीय मूल्यों और प्रगतिशील जीवन-दृष्टि में आती हुई गिरावट की कहानी है। एक तरह से यह उस शहर के बीस साल के इतिहास का सांस्कृतिक सर्वेक्षण भी है और उसका इतिहास लेखन भी. इतिहास को यह करवट केवल इस शहर में ही नहीं दिलाई जा रही थी बल्कि कहानी प्रधानमंत्री (दिल्ली) से लेकर मुख्यमंत्री (दौलताबाद कह लीजिये) तक के माध्यम से अखिल भारतीय स्तर पर व्याप्त है. जैसे श्रीलाल शुक्ल के ‘राग दरबारी’ में रुप्पन बाबू को लगता है, “मुझे तो लगता है दादा सारे मुल्क में यह शिवपालगंज ही फैला हुआ है.” वैसे ही यह शहर पूरे मुल्क की कथा और कष्ट समेटे हुए है. पुतले से शहर को ही नहीं ‘सारे देश’ को संताप था, “पिछले बीस सालों से नगर ही नहीं, सारा देश जी संताप झेल रहा था,....”
इस बौने समय में मनुष्यता और कला निर्वासित कर दी गयी है। मनुष्यता और कला का निर्वासन पुरुषोत्तम अग्रवाल के कथा साहित्य के केंद्र में है। यह संयोग नहीं है कि कहानीकार की पहली कहानी ‘चेंग चुई’ भी स्थापत्य कला के एक रूप के अनुसार बने बंगले में निर्वासित अनुभव करते मनुष्य को लेकर लिखी गयी थी। ‘चौराहे पर पुतला’ में मूर्ति कला है। मनुष्य की मूर्ति है- पुतला। यहाँ पुतले के रूप में मनुष्य निर्वासित है। कहानीकार ने आज के मनुष्य के निर्वासन को अधिक स्पष्टता से उजागर करने के लिए ही पुतले का एक इन्सान के रूप में वर्णन किया है अर्थात् पुतले का मानवीकरण किया है। पुतले के मानवीकरण के माध्यम से उसे आज के मनुष्य के निर्वासन की दर्दनाक स्थिति को व्यक्त करने में अधिक सफलता मिली है।

कहानी का नायक एक पुतला है। एक कला-रूप है। पुतले के माध्यम से वे समाज में मनुष्य के लिए बची जगह की पैमाइश भले ही करते हैं लेकिन यह कहानी मूलतः कला के स्वधर्म की रक्षा की चिंता की कहानी है। कला के स्वधर्म के बहाने मानव-धर्म के लिए सिकुड़ती जगह की चिंता कहानी की केन्द्रीय चिंता है। कला का स्वधर्म, मनुष्य का स्वधर्म है। कला के स्वधर्म का विरोध असल में मानव-धर्म का विरोध है। यह कहानी, कला के स्वधर्म के पक्ष में और मानव-विरोधी समय और संस्कृति के परतों को उजागर करने वाले मानवीय विवेक की कहानी है।

‘पुतला’ एक स्वतंत्र, प्रसन्न, आदिम और अनावृत मानवीय व्यक्तित्व, का प्रतीक, है। मनुष्यता विरोधी समय और संस्कृति उसे पचा नहीं पातीं। सभ्यता की परतंत्रता एक आदिम मानवीय रूप को स्वतंत्र और जीवित नहीं रहने देना चाहती। उस सांस्कृतिक विमर्श का बोलबाला है जिसे कलाओं में अभिव्यक्त होने वाला मनुष्य का आदिम और अनावृत रूप अश्लील लगता है। और, जिसका अभिप्रत सेंसर्ड और पराधीन मानवता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की इस मानवता-विरोधी, कला विरोधी राजनीति को कंुठित और स्त्री-विरोधी प्रगतिशील (?) बौद्धिक लोगों का साथ मिलता है। ढुलमुल और नाप-तौल कर चलने वाली राजनीति कला को, मनुष्य को न केवल बचा पाने में असफल होती है बल्कि वह भी उनके साथ हो लेती है - मनुष्यता और कला की स्वतंत्रता के हरण के लिए। उसे सेंसर करने के लिए तीनों में होड़ लग जाती है। फलस्वरूप पुतले को ‘चढ्ढी’ पहनाने के सांस्कृतिक अभियान की विजय होती दिखायी देती है। बहुत दिनों से चारदीवारी में कैद करके निर्वासित की गयी कला - मनुष्यता को सेंसर करने का प्रयास किया जाता है, अर्द्ध-पराधीन कर दिया जाता है।
आज की दुनिया में किसी समुदाय की भावना-आहत होने के और अश्लील होने के आरोप में कलाकृतियों, रचनाओं और फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। कलाकारों-लेखकों को देशनिकाला दे दिया जाता है। मकबूल फिदा हुसैन, सलमान रूश्दी और तस्लीमा नसरीन के साथ जो कुछ हुआ और हो रहा है उससे कौन संवेदनशील हृदय चिंतित नहीं है? ‘चौराहे पर पुतला’ में लेखक ने इन्हीं चिंताओं को व्यापक परिप्रेक्ष्य में वाणी देने की कामयाब कोशिश की है। इसलिए इसे कला के स्वधर्म की रक्षा करने वाली कहानी कहना चाहिए।

प्रतिरोध की आवाजें कहानी में जिस तरह गुम हैं, उससे यह स्पष्ट है कि स्वतंत्र मनुष्य के प्रतीक, कला के स्वधर्म के प्रतीक पुतले को पूर्णतया लुप्त या पराधीन करने की दिशा में चढ्ढी पहनाने की सांस्कृतिक कार्यवाही पहला कदम है। ध्यान रखें, आखिरी नहीं। और वह दिन दूर नहीं जब पुतला हटा दिया जाएगा, जब मनुष्य-धर्म, कला का स्वधर्म विलुप्त कर दिया जाने वाला है। यह कहानी कला के स्वधर्म और मनुष्यता के संकटग्रस्त होने की सूचना और फासीवाद की आसन्न आहटों की ओर ध्यान देने, कान देने के लिए सावधान करती है। यह मानवता विरोधी, कला विरोधी समय में फँसी मनुष्यता, कला को देखने के लिए आँख खोल देने वाली कहानी है।

समय के बौनेपन की इन्तहां यह है कि लोगों को 20 सालों में 5 साल का पुतला 25 साल का लगने लगता है। इस प्रसंग के वर्णन में लेखक ने कुछ-कुछ जादुई यथार्थवादी शैली का सहारा लिया है। जिससे लगता है कि पुतला सचमुच में बढ़ गया है लेकिन, सच तो यह है कि विकास पुतले में नहीं हुआ है बल्कि इसके विपरीत संकुचन आदमी में हुआ है। उसमें संकीर्णता बढ़ी है। सांस्कृतिक राष्ट्रवादी राजनीति और नैतिकतावादी दुराग्रहों के फलस्वरूप 20 सालों में आदमी में बौनापन आया है। जिस अनुपात में यह बौनापन बढ़ा है, उसी अनुपात में निर्जीव पुतले की उम्र अधिक लगती है। जिन आँखों को ’गोल दीवारों में कैद’ पुतला दीवारों को तोड़ने के बाद 25 साल का लगता है, वे आँखें स्वयं ’गोल दीवारों की कैद’ में हैं। सच तो यह है कि पुतले को कैद करने के पहले ये आँखें स्वयं को कैद कर चुकी थीं। इसी कैद से पुतले को कैद करने का विचार प्रसूत हुआ था। और तब से ये आँखें और पुतला दोनों कैद में रहते आये हैं।

बिडम्बना यह है कि इसके लिए राजनीतिक वर्ग में सर्वसम्मति है। आज जिसे पुतले की मुक्ति और ’आँखों’ को संताप से मुक्त करने का सांस्कृतिक-राजनीतिक कार्यक्रम कहा जा रहा था और जिसमें मुख्यमंत्री, प्रतिपक्ष के नेता और प्रगतिशील बुद्धिजीवी के साथ-साथ मीडिया और नगर की जनता शामिल थी, वह असल में सांस्कृतिक पतन के एक चरण पूरे होने का उत्सव था। जिसमें पुतले और संस्कृति की कैद पर वैधानिक, लोकतान्त्रिक, धार्मिक, बौद्धिक और न्यायिक मुलम्मा चढ़ना था। इससे उपजी स्थिति - सांस्कृतिक पतन और उसके सर्वग्रासी रूप की भयावहता- का कहानीकार ने कॉमिक-व्यंग्य शैली में वर्णन किया है। इस जुलूस, जिसमें ’’राजनैतिक जुलूसों वाला छिछोरा जोश नहीं, धार्मिक चल-समारोह सरीखा भावपूर्ण उत्सव था।’’ को देखकर मुक्तिबोध की कहानी ‘अँधेरे में‘ के रात में निकलनेवाले जुलूस की सहज ही याद आ जाती है, जिसमें डोमाजी उस्ताद, राजनेता, कवि, पत्रकार सब शामिल थे। ‘‘चौराहे पर पुतला’ में भी सब मिले हुए हैं, सब एक साथ हैं।

चड्ढी असल में पुतले को नहीं बल्कि मानवीय विवेक को पहनाई गयी है। चड्ढी से पुतले की नग्नता को नहीं ढँका गया है बल्कि इससे समय के बौनेपन को ढँकने की कोशिश की गयी है। कहानीकार की सफलता यह है कि पुतले को चड्ढी पहनाने के बहाने उसने भयावह समय के तहों से पर्दा उठा दिया है। ‘‘गंगाधरजी को समझ नहीं आ रहा था कि इस उलटबाँसी का क्या अर्थ निकालें कि जीवित होने का दावा करने वाले मनुष्य जिस कलिकाल में बौने होते जा रहे हैं, उसी कलिकाल में पत्थर का यह जड़ पुतला अपने कद में बढ़ता चला गया था। जो चड्ढियाँ पुतले को पहनाने के लिए लायी गयी थीं, वे उसकी निर्वस्त्रता के आगे छोटी पड़ गयी थीं, और उसे चड्ढी पहनाने पर आमादा अक्लें उसकी हिमाकत के सामने बौनी हो गयी थीं।’’
बौद्धिक वर्ग के प्रतिनिधि चरित्र रवि सक्सेना के माध्यम से कहानीकार ने बौद्धिक वर्ग की भी आलोचना की है। अवसरवादी, भटका हुआ स्त्री विरोधी बौद्धिक वर्ग कैसे इस पतन में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति के काम आता है, रवि के चरित्र के माध्यम से कहानीकार इस स्थिति को विस्तार से दिखाया है। रवि प्रगतिशील और वामपंथी होने के बावजूद फ्रायडीय चिंताओं से परेशान मर्दवादी हैं। उन्हें लगता था कि पुतला उनके वैवाहिक जीवन को नष्ट किए दे रहा है। वे लगभग कामविकारों के रोगी हो चुके थे इसलिए पुतले को शत्रु मानने लगे थे। ऐसे प्रगतिशीलों के स्त्री विरोधी चरित्र को कहानीकार ने विस्तार से उकेरा है, ‘‘प्रगतिशीलता के चक्कतर में कब तक उस हरामी पुतले को इजाजत देता कि वह मेरी लुगाई को लुभाता रहे .... प्रगतिशील हूँ, वामपंथी हूँ नामर्द तो नहीं।’’ यह एक हास्यास्पद चरित्र है।

इसके अलावा लेखक-कलाकार सब इस स्थिति में इतना ढल गए थे कि वे कला के स्वधर्म की रक्षा के प्रति बेपरवाह हो चुके थे। ‘‘रहे कलाकार, लेखक आदि, सो उनमें से अधिकांश धीरे-धीरे मानने लगे थे कि यार, ‘और भी ग़म हैं, ज़माने में पुतले के सिवा।’’’ कला की स्वायत्तता के लिए वे कलाकार भी अब उदासीन हो गये हैं, जो राजसत्ता से मेल-जोल बनाकर कला का व्यापार करते हैं। बौद्धिक और कलाकार-समुदाय की यह अवसरवादिता और उदासीनता सबसे ज्यादा अखरती है। समय और संस्कृति का बौनापन इतना सर्वग्रासी है कि लेखक, बृद्धिजीवी और कलाकार भी उसमें शामिल दिखायी देते हैं। सबके लिए बहाना यह है कि ‘‘न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान सबको करना ही होगा।’’ कहानीकार ने इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति पर चोट की है। एक प्रगतिशील, कला के स्वधर्म के प्रतिबद्ध लोकतांत्रिक मिजाज के बौद्धिक-कलाकार समुदाय की कमी भी स्थिति के बदतर होने के लिए जिम्मेदार है। कहानीकार की अंतर्दृष्टि यही कहती है कि ऐसे सुदृढ़ और गतिशील बौद्धिक-कलाकार समुदाय के बिना स्थिति को बदला नहीं जा सकता है, मनुष्य और कला के लिए जरूरी जगह निर्मित नहीं की जा सकती है। मनुष्य और कला का संघर्ष एक ही है।

जिन ‘बहू-बेटियों’ के चरित्र की रक्षा के नाम पर सारा पुरुषवादी सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व्यापार चलाया जा रहा है, उनका पक्ष सचमुच में अनुपस्थित है। कोई उनका पक्ष जानने की कोशिश नहीं करता है- न बुद्धिजीवी, न राजनीति और न ही न्यायिक आयोग। ऐसे में इस स्थिति का सबसे अधिक शिकार औरतें ही होती हैं। जया के चरित्र के माध्यम से कहानीकार ने पूरे ‘सांस्कृतिक-लोकतांत्रिक-न्यायिक-धार्मिक माहौल’ में स्त्री की पराधीनता और उसके निर्वासन को बड़े मार्मिक ढंग से उजागर किया है। ‘‘जया कभी-कभी सोचती थी कि मुझे तो बस पुतले को देख कर हँसी आई थी, रवि को मेरे गालों पर लाज की लाली कैसे दिख गयी? मैं पुतले को देख कर कम हँसी थी, और रवि के भोल से बुद्धूपन पर अधिक। इस भोलपन को बेवकूफी में किसने बदला? जिस प्यार से मैं हँसी थी, उसे बेतुकी तुलना में किसने बदला? दोस्ती की जिस जमीन पर खड़ी मैं हँस रही थी, उसमें निराधार ईर्ष्या की बारूदी सुरंग किसन लगाई? जया इन प्रश्नों के उत्तर जानती थी, लेकिन जानने का फायदा क्या था?’’ सब कुछ जानते हुए भी वह कुछ बोलने के लिए स्वतंत्र नहीं थी। ‘‘जया के लिए तय करना मुश्किल हो चला था कि वह इस बीमार इंसान पर दया करे या इस कूढ़मगज, जिद्दी पति पर एक हाथ जमा दे।’’ उक्त अंश आज के स्त्री-चेतना और आधुनिकता के दौर में स्त्री की बेबसी और पराधीनता को बड़े कारुणिक ढंग से व्यक्त करते हैं।

कहानी में सामयिक विमर्शों की महत्वपूर्ण और अर्थपूर्ण उपस्थिति है। विविध सामयिक विमर्शाें की भाषा और अनुगँूज पूरी कहानी में व्याप्त है। इसलिए यह कहानी अपनी संरचना में अच्छी-खासी बौद्धिक कहानी है। विभिन्न विमर्शाें को एक साथ रखकर इतनी रचनात्मकता पैदा करना निश्चय ही एक बड़ी संवेदनात्मक और रचनात्मक चुनौती रही होगी। लेकिन, हास-परिहास और व्यंग्य की आद्यांत अंतर्धारा में ये विमर्श उपस्थित होकर भी रचनात्मकता को बाधित नहीं करते हैं। हाँ, यह अवश्य है कि दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियों के आदती के लिए इस कहानी को समझना ज़रा मुश्किल हो सकता है। इस कहानी को समझने के लिए एक निश्चित स्तर की बौद्धिकता जरूरी लगती है।
  
इन विमर्शों की शब्दावली और पद-बंध सीधे-सीध कहानी में प्रयोग किये गये हैं। लेकिन भाषा जिस तरह से खिलंदड़ई करते हुए, पाठक को चकित करते हुए आगे बढ़ती है उसमें ये जरा भी अखरते नहीं हैं। ‘शारीरिक-समीक्षा’, ‘लुगाई-लुभावन’, ‘पधराये रहेंगी’, ‘सांस्कृतिक-ठुकाई’, ‘आनंद-कथा’, ‘बिगूचन-तत्व’, ‘बिटर-बिटर आँखें खोले रहने वाली’ जैसे नये-नये शब्द प्रयोगों और ‘परवारे’, ‘खोंचड़’ जैसे कई विस्मृत हो चुके शब्दों की वापसी से भरी भाषा में विमर्शों की शब्दावली और पद-बंध खप जाते हैं और रचना के भावबोध और विचारलोक को बहुश्रुत और स्तरीय बनाते हैं। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, भारत माता की अवधारणा, दक्षिणपंथ, इतिहास-देवता, फ्रायडवाद, मनोविश्लेषण, राजनीति और साहित्य, पतनशील सामंतवाद, मार्क्सवाद, वर्गच्युत, प्रगतिशील, वामपंथ, मेल शाविनिज़्म, समता, स्वाधीनता, कुंठा, संत्रास, न्यायिक आयोग, निर्वासन, अकेलापन, कला और अश्लीलता, भोक्ता और रचयिता, अस्मिता, कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वाधीनता, राज्य सत्ता और कला, लोकतंत्र, पुरुषवाद, प्रतिक्रियावाद, इंफोटेनमेंट क्रान्ति, ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, वैज्ञानिक दृष्टि, आधुनिकतावाद, अनुभव और अनुभूति, इकॉनामी ऑव स्केल, हृदय-परिवर्तन, ऐतिहासिक भूल, वस्तुनिष्ठ ऐतिहासिक आकलन, द्वंद्वात्मक पद्धति, थीसिस-ऐंटी थीसिस, सिन्थेसिस, मध्य-मार्ग, कलावाद, कलात्मक मूल्य, कलाकृति की इयत्ता, कला की स्वायत्तता, कानून का राज, कलियुग, पालिटिकली इनकरेंक्ट, और सार्वजनिक नैतिकता जैसे पद विविध विमर्शों का प्रतिनिधित्व करते हैं। विमर्शों की शब्दावली और पद-बंध कहानी को बहुलार्थी और अर्थसघन बनाते हैं। हिंदी के कई मुहावरों का भी रचनात्मक प्रयोग पाठकों का ध्यान खींचता है।

कोई भी रचना अपने समय के यथार्थ को अभिव्यक्त करती है। लेकिन वह सामयिक घटनाओं और तथ्यों की रपट नहीं होती है। यह कहानी भी यथार्थपरक है। वह यथार्थ जो हमारे राजनीतिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक जीवन के अनुभवों की प्रामाणिकता पर आधारित है। इसमें समकालीन घटनाओं, व्यक्तियों और विमर्शों की उपस्थिति है। अपने समय की विभिन्न घटनाओं की अनुगूंज इस कहानी में सुनाई देती है। समकालीन जीवन की न जाने कितनी घटनाओं, व्यक्तियों और विमर्शों की प्रतिध्वनि और रेखांकन कहानी में आपको मिलेगा। यह हर पाठक की अपनी जानकारी और समझदारी पर निर्भर करेगा। फिर भी यह कहानी न समकालीन घटनाओं का रिपोर्ताज है और न ही प्रतिछवि। यह कहानीकार के अपने युगीन यथार्थ की रोचक पुनरर्चना है। यही होता है साहित्य। यही होती है यथार्थपरक कला। 

आनंद पांडेय ने जवाहरलाल नेहरु विश्‍वविद्यालय से उच्‍च शिक्षा प्राप्त की है। यहीं से पीएच.डी. की। लंबे समय तक छात्र-राजनीति से जुड़े रहे। इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य में संलग्न हैं। साहित्यिक और सामाजिक सरोकार के साथ लेखन में सक्रिय हैं। इनसे anandpandeymail@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

'हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान' का लोकार्पण

‘अकथ कहानी प्रेम की : कबीर की कविता और उनका समय’ के यशस्वी आलोचक प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल के यात्रा-आख्यान ‘हिंदी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान’ का विमोचन कल शाम इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में संपन्न हुआ. राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित इस पुस्तक का लोकार्पण अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् के अध्यक्ष डॉ. कर्ण सिंह ने किया. राज्य सभा सदस्य देवी प्रसाद त्रिपाठी, जनसत्ता के संपादक ओम थानवी एवं मन्नू मित्तल ने पुस्तक पर अपने विचार व्यक्त किये. युवा आलोचक रवींद्र त्रिपाठी ने कार्यक्रम का सञ्चालन किया.

लोकार्पण के बाद यात्रा-वृत्तान्त के लेखक प्रो. अग्रवाल ने किताब के चुने हुए अंशों का पाठ किया जिससे स्पष्ट हुआ कि यह वृत्तान्त सर्जनात्मक गद्य का सुन्दर उदाहरण है. लेखक ने इसे लिखने की प्रेरणा, रचना-प्रक्रिया और अनुभवों को भी श्रोताओं से साझा किया. उन्होंने कहा कि यह पुस्तक उन चिंताओं का विस्तार है जो पिछले कई सालों से मुझे सताती रही हैं. व्यापार जब यूरोप में बढ़ता है तो उसके कारण सामाजिक परिवर्तन होते हैं, औद्योगिक क्रांति होती है, साम्राज्यवाद आता है लेकिन भारत में व्यापार के विकास के बाद भी जडता बनी हुई थी- यह इतिहासबोध मुझे वाजिब नहीं लगता है. इस इतिहासबोध की गुत्थी को सुलझाना भी इस किताब का, इस यात्रा का एक मकसद रहा है और मेरे लेखन की केन्द्रीय चिंता भी रही है. अगर हम अपने इतिहास पर ध्यान दें तो औपनिवेशिक ज्ञानमीमांसा के कई झूठों से मुक्त हुआ जा सकता है.
  
डॉ. कर्ण सिंह ने इस किताब की अंतर्राष्ट्रीय उपयोगिता और आवश्यकता को रेखांकित करते हुए इसे अंग्रेजी में अनूदित करने का सुझाव दिया. इस किताब में ‘औपनिवेशिक ज्ञानकांड’ (लेखक के प्रिय पदबंधों में से एक) द्वारा भारत के बारे में रचे गए कई ‘मिथों’ या यूँ कहें कि ‘झूठों’ का पर्दाफाश किया गया है. शायद किताब लिखने के पीछे काम कर रही प्रेरणाओं में से एक प्रबल प्रेरणा यह भी है. भारतीय संस्कृति में समुद्र-यात्रा वर्जित थी- यह एक मिथ भी जरूरत से ज्यादा रचा और फैलाया गया था. इस किताब में इस ‘मिथ’ का खंडन किया गया है. किताब के इस पक्ष पर ध्यान केंद्रित करते हुए डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि औपनिवेशिक सोच के लोगों का यह कहना आश्चर्यजनक है कि भारतीय संस्कृति में समुद्र-यात्रा को वर्जित कार्य माना गया था. उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय संस्कृति का पूर्व में जिस तरह से प्रचार हुआ और जिस तरह से हिंदू और बौद्ध संस्कृति को बाहर स्वीकृति मिली उससे यह बात निराधार साबित होती है. उन्होंने कहा कि प्राचीन भारतीय संस्कृति में ऐसी कोई वर्जना नहीं मिलती है.

पुस्तक में कुल ३९ चित्र भी हैं जिन्हें लेखक ने स्वयं यात्रा के दौरान खींचा था. इसके अतिरिक्त भारत-अस्त्राखान के चार प्रमुख व्यापारिक मार्गों को दर्शाने वाला एक मानचित्र भी है. डॉ. कर्ण सिंह ने चित्रों की भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा कि ये चित्र न केवल वृत्तान्त को रोचक और प्रामाणिक बनाते हैं बल्कि कला की दृष्टि से भी उम्दा हैं. उन्होंने कहा कि यदि इसमें अस्त्राखान और येरेवान (आरमेनिया की राजधानी) का मानचित्र भी होता तो पाठकों को आख्यान से अपने आपको जोडने में और अधिक सहूलियत होती.

लोकार्पण: (बाएँ से) प्रो. मन्नू मित्तल, श्री डी. पी. त्रिपाठी, डॊ. कर्ण सिंह, प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल, वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी 
देवी प्रसाद त्रिपाठी ने दर्शन, समाजशास्त्र, इतिहास, धर्मशास्त्र, संस्कृति और साहित्य सभी दृष्टियों से इस किताब को बहुत महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने बल देकर कहा कि विभिन्न अनुशासनों की अंतर्क्रिया इस यात्रा वृत्तान्त को अनोखा बनाती है. भूमिका –‘बयान शुरूआती’ में लेखक ने इस किताब को ‘ट्रेवेलाग’ (यात्रा वृत्तान्त) के साथ-साथ ‘थॉटलाग’ (विचार यात्रा) भी कहा है. इसके आशय को उद्घाटित करते हुए त्रिपाठीजी ने कहा कि यह किताब आज के अस्त्राखान और आरमेनिया की राजधानी के माध्यम से पूर्व संयुक्त रूस के सभी देशों में धर्म और संस्कृति के साथ-साथ व्यापार के विकास का एक महत्पूर्ण पाठ प्रस्तुत करती है. उन्होंने कहा कि यात्रा वृत्तान्त की भाषा वैसी ही प्रवाहमान होनी चाहिये जैसे यात्रा के दौरान यात्री निरंतर चलायमान रहता है. इस अर्थ में किताब का गद्य वैसे ही प्रवाहमान है जैसे नदियाँ होती हैं, जैसे जीवन होता है. यह पुस्तक कई अर्थों में विचारों, विधाओं और विश्लेषणों का संगुम्फन है. “इस अर्थ में यह सिर्फ हिंदी साहित्य में ही नहीं, सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में एक अनुपम कृति है. यह पुस्तक भारतीय मानस में व्याप्त सबसे विकट इतिहासबोध को विखंडित करती है.” श्री त्रिपाठी ने कहा, “औपनिवेशिक इतिहासबोध के सबसे विकट कुपरिणामों को किताब सप्रमाण रेखांकित और विखंडित करती है, पाठक को पुनर्विचार की प्रेरणा देती है."

ओम थानवी ने सरस गद्य के लिए लेखक को बधाई दी. उन्होंने कहा कि इस किताब को पढ़ने के बाद लगता है कि यह साहित्यिक विधाओं के दायरों को तोडती है इसलिए यह एक महत्वपूर्ण रचना है. यह किताब केवल पावों की यात्रा नहीं है बल्कि विचारों की भी है. इसलिए यह एक बड़ी किताब है. ओम थानवी के अनुसार पुरुषोत्तम अग्रवाल ने इस वृत्तान्त में नृतत्वशास्त्र और इतिहास की खोजों का प्रयोग किया है. यह किताब परंपरा और समकालीनता को एक सूत्र में पिरोती है तथा इतिहास के कई पूर्वग्रहों को तोडती है. 

पुस्तक का पहला अध्याय- ‘मैं रक्तरंजित अनाथ कवि.....’ येरेवान के कवि येगिशे चारेंत्स पर है. इस अध्याय में आरमीनियाई पेंटर अलेग्जेंडर बाज्ब्यूक मेलिक्यान का बनाया चारेंत्स का स्केच – ‘महात्मा चारेंत्स’ भी शामिल किया गया है. अपने इस स्केच पर चारेंत्स ने लिखा है: “तुम्हारी आत्मा अभी ताक अनुभवरहित है, अभी तक तुम कमजोर हो, चारेंत्स. आत्मा को मजबूत करो. पुजारी, योग्य, सूर्य बनो, जैसे महात्मा गाँधी – प्रतिभाशाली हिन्दुस्तानी...२४.०१.१९३६.” श्री थानवी ने इस मार्मिक पक्ष को उद्घाटित करने के लिए पुरुषोत्तम अग्रवाल की प्रशंसा की और कहा कि यह अंश मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत प्रिय लगा.

जेएनयू की प्रोफेसर मन्नू मित्तल ने कहा कि पुरुषोत्तमजी ने इतना सजीव और जीवंत वर्णन किया है कि पाठक के सामने पूरा चित्र सामने आ जाता है. यह केवल यात्रा वृत्तान्त नहीं है बल्कि शोध भी है. उन्होंने कहा कि व्यापारिक रास्तों की खोज के माध्यम से पुरुषोत्तम जी ने भारत और मध्य एशिया के सांस्कृतिक संबंधों की पड़ताल की है. अस्त्राखान के व्यापारियों के साहसिक जीवन को यह किताब पाठकों के सामने लाती है. मन्नू मित्तल ने कहा कि नवंबर के पहले सप्ताह में जेएनयू में आयोजित सिल्क रूट कांफ्रेंस में इस किताब पर आधारित व्याख्यान बहुत सराहा गया था, अपने काव्यात्मक मुहावरे के साथ ही, इस ऐतिहासिक तथ्य को रेखांकित करने के कारण भी कि सिल्क रूट केवल पश्चिम और पूर्व के बीच नहीं, उत्तर और दक्षिण के बीच भी था; याने भारत ही नहीं अफ्रीका के इतिहास पर भी पश्चिमकेन्द्रित दृष्टि से बाहर निकल कर सोचने की जरूरत है.

ऑडियेंस में नौजवान बड़ी तादाद बल्कि अक्सरियत में थे, यह आज के किसी भी साहित्यिक कार्यक्रम के सम्बन्ध में रेखांकित करने योग्य, सुखद बात है. अक्सर यह बात प्रचारित की जाती है कि हिंदी लेखक लोकप्रिय नहीं हैं, और साहित्यिक कृतियों में युवा पीढ़ी की रूचि तेजी से घट रही है. इस कार्यक्रम में युवाओं की बड़े पैमाने पर भागीदारी यह साबित करती है कि हिंदी के लेखक लोकप्रिय भी हैं और युवाओं की साहित्य और गंभीर विमर्श में रूचि भी कम नहीं है. इसके अतिरिक्त राजधानी के गणमान्य बुद्धिजीवी, साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी, प्राध्यापक और पत्रकार भी बड़ी संख्या में मौजूद थे.


प्रस्तुति - आनंद पांडेय। आपने जवाहरलाल नेहरु विश्‍वविद्यालय से उच्‍च शिक्षा प्राप्त की है। एनएसयूआई के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव रह चुके हैं। इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य में संलग्न हैं। साहित्यिक और सामाजिक सरोकार के साथ लेखन में सक्रिय हैं। इनसे anandpandeymail@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

'आपका स्थान' विषय पर प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल का वक्तव्य

लोकमत समाचार द्वारा आयोजित उसकी रचना वार्षिकी -2012 'दीप भव' (अतिथि संपादक: अशोक वाजपेयी) के विमोचन के अवसर पर इण्डिया इस्लामिक सेंटर , नयी दिल्ली, में 6 नवम्बर, 2012 को 'आपका स्थान' विषय पर दिए गए प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल के भाषण की यह अविकल प्रस्तुति है। प्रस्तुति आनंद पांडेय़ के सौजन्य से। : संपादक
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'आपका स्थान' विषय पर प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल का वक्तव्य

मित्रों,
आमतौर से लेखकों और बुद्धिजीवियों की गोष्ठियों में हमारा समय इस तरह के विषयों पर बातचीत होती आई है। बहुत बार हम लोग बात करते रहे हैं। लेकिन मेरा अनुमान है कि ये विषय वाजपेयी जी का सुझाया हुआ है और इस तरह की क्रिएटिव शरारतों की उम्मीद अगर हम लोग अशोक वाजपेयी से नहीं करेंगे तो किससे करेंगे? तो हमारा स्थान, जब मैं इस विषय पर सोचने लगा, तो जाहिर है कि इस विषय में स्थान शब्द एक तरह का रूपक है और ये उस अर्थ का विस्तार है जिस अर्थ में कई बार जैसे कानूनी और सरकारी दस्तावेजों में हम लोग एक फ्रेज पहले इस्तेमाल करते थे। दिल्ली के बाहर हो सकता है, अभी भी इस्तेमाल करते हों क्योंकि दिल्ली में तो सरकारी दस्तावेज तो केवल अंग्रेजी में होते हैं, लेकिन दिल्ली के बाहर का जो हिंदुस्तान है, उसमें सरकारी दस्तावेजों में एक जमाने में फ्रेज हुआ करता था, जैसे अगर मैं अपने ही बारे में कहूँ तो पुरूषोत्तम पैदाइश ग्वालियर, साकिन दिल्ली, हाल मुकाम जहाँ भी आप हों, मिसाल के तौर पर हाल मुकाम इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर।

तो हम कहाँ हैं, कहाँ से आये हैं, और फिलवक्त कहाँ हैं? इस सवाल पर मुझे लगता है कि ज्यादे प्रामाणिक ढंग से बात मैं अपने ही हवाले से कर सकता हूँ। जड़ों की बात आई, और शायद अंक भी जड़ों पर केंद्रित है, जड़ों की खोज पर ..... एक व्यक्ति के तौर पर अगर मैं देखूँ और जो रूपक स्थान से भी जुड़ता है उसी को आगे बढ़ाऊँ, तो मेरी जड़ें वैष्णव पिता और जैन माँ में हैं। मेरी जड़ें उस संवाद में हैं जो इन दो महान् और कभी-कभी विवादास्पद, और उस विवाद को मैं अपने घर में भी देखता था। वो वैष्णव और जैन विवाद मेरे लिए केवल एक थ्योरेटिकल विवाद नहीं था, वो मेरे लिए प्रत्यक्ष का अनुभव भी कई बार होता था लेकिन इसके बावजूद, उस सारे विवाद के बावजूद मेरे रक्त में जो बहता है, वो विवाद कम है और संवाद ज्यादे है। वो वैष्णव परंपरा का और जैन परंपरा का जो संवाद था..... और अपनी माँ को याद करते हुए एक अद्भुत अनुभव मैं कभी भूल ही नहीं सकता। मेरे स्वर्गीय बड़े भाई एक खास तरह की राजनीति के पैरोंकार थे, बल्कि उसके ऐक्टिविस्ट थे और जिसे कहते हैं कि पूत के पाँव पालने में ही दिखने लगते हैं तो उनके राजनीतिक रूझानात बचपन में ही दिखने लगे थे। और कह सकते हैं कि मेरे भी कुछ-कुछ दिखने लगे थे। तो, वो चर्च द्वारा कुछ परीक्षाएँ आयोजित की जाती थीं, बाइबिल की। बच्चे थे हम, मैंने वो परीक्षाएँ दीं। दो-चार दफे जाकर क्लासेज कीं। फिर कुछ परीक्षा दी और मैंने परीक्षा पास कर ली। तो पुरस्कार में मुझे ईसा मसीह की एक तस्वीर मिली। मैं बड़े उत्साह से उस पुरस्कार को लेकर घर आया। मेरे बड़े भाई आगबबूला हो गये, उस तस्वीर को देखकर कि ये तो नहीं चलेगा, ये सब कहाँ से घर में आ जाएगा? युद्ध हुआ, युद्ध में उन्होंने मेरी ठीक-ठाक से पिटाई भी कर दी और मैं सिवाय रोने के और ये धमकी देने के कि मैं खाना नहीं खाऊँगा, और क्या कर सकता था! 

माँ ने जो रास्ता निकाला, वो अद्भुत था। उन्होंने वो तस्वीर उठाई और ले जा करके अपने पूजाघर में रख दी। पूजाघर, बाद के पूजा घरों और देवस्थलों की तरह हिंसा के लिए आउट ऑफ बांड्स हो या न हो, लेकिन मेरे घर में मेरी माँ का पूजाघर मेरे बड़े भाई की तमाम हरकतों के लिए आउट ऑफ बांड्स था। तो ईसा मसीह जब एक बार वहाँ पधर गए तो फिर तो वो हर तरह के खतरे से बाहर निकल गए। और माँ के अंतिम समय तक ईसा मसीह वहाँ जमे रहे और अपने विभिन्न प्रकार के प्रसाद हर त्यौहार पर दिवाली से लेकर क्रिसमस तक, कृष्ण जन्माष्टमी से ले करके रामनवमी तक, विभिन्न प्रकार के त्यौहारों पर वे विभिन्न प्रकार के भोग ग्रहण करते रहे और हम लोगों को जो प्रसाद मिलता था उसमें से एक अंश जीसस क्राइस्ट का भी होता था। तो, जड़ें तो वहाँ हैं। और मुझे लगता है कि मेरे जैसे करोड़ों आम हिंदुस्तानियों की जड़ें वहीं हैं। और इसीलिए वो चमत्कार, वो अजूबा मुमकिन हो पाता है जिसकी चर्चा अभी थोड़ी देर पहले फारूख साहब कर रहे थे। लेकिन, जब हम अपने स्थान की बात करते हैं, तो कहीं-न-कहीं वो बात अपने समय की बात से जुड़नी ही है। क्योंकि आज मैं जहाँ खड़ा बात कर रहा हूँ वो अपनी जगह महत्वपूर्ण है लेकिन मैं जिस वक्त खड़ा बात कर रहा हूँ वो कम महत्वपूर्ण नहीं है। 

बल्कि, मुझे लगता है हमारे यहाँ देशकाल शब्द का प्रयोग साथ-साथ किया जाता है। देशकाल-विवेक, देशकाल के अनुकूल बात करना, देशकाल के प्रतिकूल बात करना। तो, देश और काल परस्पर संवादरत वास्तविकताएँ हैं। और अगर काल को देखता हूँ तो इक्कीसवीं सदी का ये समय, जो एक ऐसा समय है कि जिसमें इमारतें बड़ी-से-बड़ी होती जा रही हैं और अक्ल और न्याय का बोध छोटे-से-छोटा होता चला जा रहा है। कई बार मित्रों, मुझे लगता है कि हम एक बेहद बौने समय में जी रहे हैं। महान् उपलब्धियों का समय है ये। मैं उन महान् उपलब्धियों को नकार नहीं रहा हूँ। वैज्ञानिक तौर पर, तकनालॉजी के तौर पर, समृद्धि की संरचना के तौर पर, धन के निर्माण के तौर पर महान् उपलब्धियों का ये समय है। और फिर भी ऐसा लगता है कि जैसे यह बहुत बौनेपन का समय है, बहुत छोटेपन का समय है, बहुत ओछेपन का समय है। ये एक ऐसा समय है, और ये केवल अपने देश में नहीं बल्कि दुनियाभर में। हम अपने देश के बारे में प्रत्यक्ष और अधिक निकट अनुभव से जानते हैं। सचाई ये दुनिया भर की है ये एक ऐसा समय है, जिसमें साझे सपने पीछे छूटते चले गए। पहचानें, तरह-तरह की पहचानें। सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, इस तरह की, उस तरह की। याने अब आलम यह है कि मिसाल के तौर पर मैं किसी के बारे में कुछ कहूँ तो मुझे ये कहा जा सकता है कि आपको कुछ नहीं कहना चाहिए क्योंकि आपका संबंध उस समूह से नहीं है। आप उस वर्ग से या उस विशेष पहचान से ताल्लुक नहीं रखते, इसलिए आप चुप बैठिए, उसके बारे में आप बात नहीं कर सकते। कहने वाले मित्र ये भूल जाते हैं कि इस तर्क से न मैं फिलीस्तीन के बारे में बात कर सकता हूँ और न चीन के मुसलमानों के बारे में बात कर सकता हूँ। कहने वाले ये भी भूल जाते हैं कि इस तर्क से मैं स्त्रियों के बारे में भी बात नहीं कर सकता और बर्मा की जनता के बारे में भी बात नहीं कर सकता। लेकिन, फिर भी ये ऐसा समय है, इस सचाई से मुँह चुराना मेरे लिए मुमकिन नहीं है, जिसमें पहचानें छाती जा रही हैं और साझे सपने धुँधले होते जा रहे हैं। 

और, अंततः मित्रों, ये ऐसा समय है, मार्टिन लूथर किंग के अद्भुद शब्दों में उनके अंतिम भाषण के शब्दों में, ये एक ऐसा समय है, मार्टिन लूथर किंग ने बिल्कुल ठीक कहा था, 1968 में और आज 2012 में ये बात उससे कहीं सौ गुना ज्यादा सच है कि अब ये वक्त नन वॉयलेंस और वॉयलेंस के बीच में चुनाव करने का नहीं है। अब ये चुनाव आप के पास बचा नहीं है कि आप हिंसा का रास्ता अख्तियार कर लें या अहिंसा का रास्ता अख्तियार कर लें। मार्टिन लूथर किंग ने कहा कि अब चुनाव वॉयलेंस और नन वॉयलेंस के बीच में नहीं है, अब चुनाव नन वॉसलेंस और नन इग्झिस्टेंस के बीच में है। या तो आप अहिंसा का रास्ता चुनेंगे या सर्वनाश का रास्ता चुनेंगे। जितने भी मतभेद हों, जितने भी टकराते हुए सपने हों, अंततः अहिंसा की ओर जाना होगा। अंततः गांधीजी के शब्दों में अगर अहिंसा की परिभाषा याद करें तो संयम और करूणा की ओर जाना होगा।

पर्यावरण की चिंताएँ आज जिस पैमाने पर पहुँच गईं हैं, सवाल अंततः वही है कि कहीं तो संयम अख्तियार करना होगा। कहीं तो सिर्फ अपने दुख की नहीं, दूसरे के दुख की भी बात करनी होगी। करूणा इसी को कहते हैं। तो मार्टिन लूथर किंग की बात याद करता हूँ कि चुनाव नन वॉयलेंस और नन इग्झिस्टेंस के बीच में है, चुनाव नन वॉयलेंस और वॉयलेंस के बीच में नहीं है। 

और, अंत में मित्रों न जाने क्यों मुझे सेवा ग्राम याद आता है। आप में से कई लोग वहाँ गये होंगे। वहाँ जो प्रार्थना स्थल है, बस वो एक साफ-सुथरी जगह है। एक तरफ चौकी है। वहाँ गांधी जी बैठकर प्रार्थना करते थे, करवाते थे और अभी भी वहाँ हर शाम को विभिन्न धार्मिक ग्रंथों का पाठ होता है। प्रार्थना होती है। वहाँ एक बोर्ड पर गांधीजी का एक वाक्य लगा हुआ है, गांधी जी का बोला हुआ एक वाक्य। और मुझे लगता है कि वो हमारे आज के विषय पर चर्चा करने के लिए ही नहीं, हमारे आज के सवालों पर सोचने के लिए भी बड़ा प्रेरणास्प्रद वाक्य है। और वो वाक्य है कि प्रार्थना के लिए खुले आकाश के नीचे जमीन का एक छोटा-सा स्वच्छ टुकड़ा सबसे अच्छा क्योंकि उस तक गरीब-से-गरीब आदमी की पहुँच है। तो गरीब-से-गरीब आदमी की पहुँच वाले स्थान की कल्पना और उस स्थान की कल्पना करने के लिए मूलभूत मानवीय और सर्जनात्मक कल्पना।

मित्रों, मुझे लगता है कि इक्कीसवीं सदी का सबसे संकट कल्पना का संकट है। इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी विफलता स्मृति और कल्पना की विफलता है। हम अपनी स्मृतियों से सीखना नहीं चाहते। हम अपने भविष्य की प्रदत्त कल्पनाओं से आगे जाकर कल्पनाएँ नहीं करना चाहते। ये सबसे बड़ा संकट है। और ये संकट ही हमारा स्थान है। हम ऐन इस संकट के बीचोंबीच खड़े हैं। मैं नहीं जानता कि ये कामना करने का पर्याप्त आधार हमारे पास है या नहीं लेकिन फिर भी यह कामना करना चाहता हूँ कि हम इस स्थान पर खड़े हो करके कल्पना के पुनर्वास का, विवेक के पुनर्वास का साहस कर सकें। तब संभवतः हम सचमुच अपने आप से कह सकेंगे कि हम दीप हुए, दीप भव होने की कामना हमने सचमुच पूरी करने की कम-से-कम कोशिश की।
धन्यवाद मित्रों।
(प्रो. 
पुरुषोत्तम अग्रवाल)



प्रस्तुति : आनंद पांडेय ने जवाहरलाल नेहरु विश्‍वविद्यालय से उच्‍च शिक्षा प्राप्त की है। एनएसयूआई के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव रह चुके हैं। इस समय में दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य में संलग्न हैं। साहित्यिक और सामाजिक सरोकार के साथ लेखन में सक्रिय हैं। उनसे anandpandeymail@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)