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शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की ' अंतिम आकांक्षा ' ..

                                                              
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ( १८८४-१९४१ ) :
                आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है | आज हम हिन्दी
साहित्य के इतिहास को आचार्यवर से अलग करके नहीं देख सकते | हिंदी साहित्य के इतिहास के
'काल-विभाजन' और 'नामकरण' दोनों में हम उनके प्रति कृतज्ञ  हैं | इसके अतिरिक्त शुक्ल जी हिन्दी
साहित्य के प्रथम व्यवस्थित आलोचक हैं | ' व्यावहारिक' और 'सैद्धान्तिक', दोनों तरह की आलोचना को
उन्होंने संस्कार दिया | निबंध लेखन में शुक्ल जी एक युग का प्रतिनिधित्व करते हैं यानी 'शुक्ल युग ' |
                आचार्य के जीवन का आरंभिक और अधिकांश समय मिर्जापुर , उ.प्र. में बीता था | यहीं उनके
साहित्यिक व्यक्तित्व का आरम्भ और विकास हुआ | यहाँ के प्रति उनकी भावुकता उनकी 'अंतिम आकांक्षा'
में व्यक्त है ---
                                  अंतिम आकांक्षा
'' लोंगों ने मुझे बनारसी समझ लिया है , यह मेरे साथ अन्याय है | मैं मिर्जापुर का हूँ और मिर्जापुर मुझे
अत्यंत प्रिय है | मैं मिर्जापुर की एक-एक झाड़ी , एक-एक टीले से परिचित हूँ | बचपन मेरा इन्हीं झाड़ियों
की छाया में पला है | मैं इन्हें कैसे भूल सकता हूँ | ''
               '' लोगों की अंतिम कामना रहती है कि वे काशी में मोक्ष लाभ करें , किन्तु मेरी अंतिम कामना
यही है कि अंतिम समय मेरे सामने मिर्जापुर का वही प्रकृति का दिव्य खंड हो , जो मेरे मन में भीतर -
बाहर बसा हुआ है | ''
              '' आपने कवि सम्मलेन की आयोजना पुस्तकालय भवन में की है , यह ठीक नहीं | दूसरी बार
कवि सम्मलेन कीजिये , तब पहाड़ पर , झाड़ियों में कीजिये , जब पानी बरस रहा हो , झरने झर रहे हों ,
तब मैं भी हूँगा और आप लोग भी | तब मिर्जापुर के कवि सम्मलेन का आनंद रहेगा | यों तो कवि सम्मलेन
सर्वत्र ही होते ही रहते हैं | ''
                                     [ साहित्य सन्देश , अप्रैल-मई , १९४१ से साभार ]
{ मृत्यु से कुछ दिनों पूर्व आचार्य शुक्ल मिर्जापुर गए थे | वहां २५-२६ जनवरी १९४१ को कवि सम्मलेन
आयोजित किया गया था | आचार्य शुक्ल को कवि सम्मलेन में सभापति के रूप में बुलाया गया था | आचार्य
शुक्ल और सोहनलाल द्विवेदी के मध्य हुई बातचीत का यह अंश है }
                                     [ आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली,भाग-८,संपा.डा.ओ.पी.सिंह, से साभार ]
एक बात और , काशी के मोक्ष लाभ से खुद  को अलग रखने  के सम्बन्ध में सहज ही कविवर कबीर दास का
ध्यान आ गया और उनकी प्यारी सी भोजपुरी कविता की पंक्ति , ---
                            '' लोकामति के भोरा रे ..
                              जौ कासी तन तजै कबीर रामहिं कौन निहोरा रे .. ''