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बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

इल्म की रोशनी और बिदकी दाढ़ियां

*शमशाद इलाही शम्स

शिक्षा के मानवीय और नैसर्गिक हक के लिए संघर्षरत स्वात-पाकिस्तान की बहादुर बच्ची मलाला युसुफजई पर तालिबान ने क्रूरतापूर्ण हमला किया। मलाला अभी भी हास्पिटल में है, हास्पिटल के अधिकारियों के मुताबिक मलाला के सिर में लगी गोली को सफलतापूर्वक निकाल दिया गया है। अब उसकी हालत स्थिर है। हमारी प्रार्थनाएँ हैं कि बहादुर बच्ची इस मौत की जंग  में कामयाब होकर निकले! इसी सिलसिले में फेसबुक पर शमशाद इलाही की टिप्प्णी सटीक है। : संपादक 
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राम-टुकडखोर पाकिस्तानी तालेबान ने १४ साला मलाला यूसुफ़ज़ई पर कातिलाना हमला करने की ज़िम्मेदारी लेकर दुनिया भर के मुस्लिमों को अपना बदसूरत चेहरा दिखाया है, यह कोई पहला और आखिरी हमला नहीं. यह कोई नई वजह भी नहीं, बस उन्हें औरतों के बीच तालीम का कोई नया उभरता हुआ सितारा गवारा नहीं. हाल में इरान की मुल्लाह हकूमत ने भी विज्ञान, साहित्य, इंजीनियरिंग विषयों के अध्ययन पर महिलाओं के खिलाफ़ पाबंदी लगा दी थी. यह भी कोई न पहला मसला है न आखिरी.

दुनिया भर में इस्लाम के नाम पर मुल्लाहों की इस गुण्डागर्दी का विरोध कब होगा? १४०० साल से औरत पर हो रहे इस एक तरफ़ा हमले का अंत कब होगा? आखिर कब तक जदीद सोच रखने वालों के खिलाफ़ गज़-गज़ भर दाढी रखने वाले मज़हबी डकैत अपना कब्ज़ा जमाये रखेंगे? आखिर कब तक मुसलमानों में दूसरी ख़तीजा को पैदा होने से रोका जाता रहेगा? आखिर पृथ्वी का यह खित्ता जिस पर कथित इस्लाम का प्रभाव अभी है अथवा रहा है उस पर इल्म की रोशनी का सूरज कब तक बस दूर ही दूर से मुँह चिढाता रहेगा?

पाकिस्तान के जनक जिन्नाह ने इस मुल्लाह नस्ल का मुकाबला बहुत कडे अंदाज़ में किया था, अपनी बहन फ़ातिमा का दाखिला जब उन्होंने बंबई के प्रतिष्ठित स्कूल में कराया था तब बडी दाढि़यां बिदकी थी खासकर उन्हें अपने फ़ैसले से आगाह कराने के लिये जिन्नाह ने फ़ातिमा को स्कूल जाने-आने के लिये घोडों की एक बग्गी बनवाई थी, मुल्लाह के विरोध को जिन्नाह ने अपने फ़ैसले के घोडों तले रौंदा था. आज उसी पाकिस्तान में दाढ़ियों का आतंक सर्वव्यापी हो गया है और जिन्नाह के चाहने वाले अपनी सोच और कर्म की दुकड़ियों में दुबके बैठे हैं, कभी बेनजीर के मरने का इंतज़ार कर रहें तो कभी सलमान तासीर के तो कभी मलाला..

क्या यह प्रश्न सिर्फ़ पाकिस्तान के मुसलमानों भर का है? अगर कोई ऐसा सोचता है तो गलत है, वह उस कबूतर की मानिंद है जो बिल्ली को देख कर आँख बंद कर लेता है यह सोच कर कि बिल्ली चली गयी, बिल्ली जाती जरुर है, लेकिन कबूतर की गर्दन उसके मुँह में साथ होती है.

इस्लाम के अंदर सफ़ाई की कई मुहीमें बडे बडे दानिश्वरों ने चलायी लेकिन आज जो सामने दिखाई दे रहा है उससे साफ़ जाहिर है कि अब न केवल रणनीति ही बदलनी होगी वरन हथियार भी बदलने होंगे, इस कबायली इस्लाम के कैंसर का इलाज अब एक सफ़ल आप्रेशन ही है, आज नहीं तो कल, हम खुद करें या कोई और, इसको पालने पोसने का वक्त चला गया है अब इससे छुटकारा पाना ही होगा.


[शमशाद इलाही शम्स इस समय टोरंटो-कनाडा में रह रहे हैं। आप सामाजिक, धार्मिक-सांस्कृतिक विषयों पर तर्कसंगत और बिना लाग लपेट के अपनी बात रखते हैं। इनसे  Shamshad66@hotmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।]