हिंदी साहित्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हिंदी साहित्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

कविता का दाय ? , या इलाही ये माजरा क्या है ? ..


??????? :- ब्लागरी जिसमें कमेन्टरी भी है , उसे समय की हलचलों से साक्षात्कार और उससे बावस्तगी का माध्यम भी मानता आया हूँ | इसलिये कुमार विश्वास को लेकर जुटे (अंध)भक्तों के समक्ष कुछ बातें रखना अनुचित नहीं होगा।

विगत माह भर से इस इन्टरनेट पर जिस एक मुद्दे पर उलझता रहा , वह है तथाकथित कवि कुमार विश्वास के 'काव्यत्व' पर लोगों तक अपनी असहमतियों को संप्रेषित करना | इसके लिए मैंने लोगों से 'सस्ती लोकप्रियता के प्रति सोच के आग्रह' की बात की थी | मैंने अपनी असहमतियां रखी थीं पर उसपर उनके प्रशंसकों के रोष-रुदन और गालियों ने बड़ा ही अजीब असंवाद का माहौल बना दिया | प्रतिक्रया में मेरा भी स्वर यत्र-तत्र तिक्त हुआ , जो कि बेशक नहीं होना चाहिए , परन्तु जिस स्तर की गालियाँ ई मेल से भेजी गयीं और  खामखा के गलत आरोप जड़े गए , वे किसी के भी धैर्य की परिक्षा के लिए काफी थे !

इन प्रशंसकों के सम्मुख मैंने यह भी रखा था --- ''  व्यक्ति की सकारात्मकता और संभावनाओं में मुझे सदैव विश्वास रहा है , इसलिए इससे भी इनकार नहीं करूंगा कि भविष्य में कुमार विश्वास अच्छा नहीं लिख सकता , अगर वह अच्छा करता है तो ‘प्रसिद्धि’ और ‘श्रेष्ठता’ दोनों एक ही व्यक्ति में मिलेगी , यह भी कम खुशी की बात नहीं , पर जो सीन इस समय है उसकी कविता की , वह असंतोषजनक और आपत्तिजनक है ! लेकिन अच्छा करने के लिए उसको अपनी आलोचनाओं को सकारात्मक ढंग से लेनी चाहिए ..'' ! इसकी भी एक झलक हो जानी चाहिए !

एक झलक भर :- इसके बाद भी जो इनके प्रशंसकों का जो रुख था उसको उनके एक प्रशंसक उचित अवस्थी की ज़ुबानी में रखना ज्यादा सही होगा | JNU में हुए कुमार विश्वास के एक परफार्मेंस की याद दिलाते हुए उचित अवस्थी फरमाते हैं --- '' @अमरेन्द्र... उन्हें तो पता भी नहीं होगा आप के इस अखंड विधवा विलाप का. .........जब आप की चेतना पर डॉ साहब का जनसमूह से सत्यापित बुलडोज़र चला था. .......जल्दी ही JNU की उसी छत से शायद नया गोरख पाण्डेय मिल जाये......और हाँ डॉ साहब अगली बार आगरा में किसी को ढूंढने जायेंगे तो आप ज़रूर मिलोगे........ पुरुष ही थे तो तब एक बार ज़रा खड़े हो कर ये सब बोल देते उस दिन जब आप की ही चटाई पर आप का मुंडन कर गए थे वो , वहीँ कारसेवा हो जाती..........इलाहाबाद इतना ज़रूर सिखाता है की ले कैसी और दे कैसी.......'' .. यद्यपि ये उचित जी ही इसके पूर्व की एक टिप्पणी पर अपने नामानुरूप एक उचित बात कह चुके थे --- '' ....... और तो और आप के ही परिसर मे वो एक स्टार की तरह आये.थैले भर रूपया, तीन घंटा भर का धमाल और पीछे भागती भीड़ बटोर कर अगले मंच पर चल दिए. आप के यहाँ के एक इरफ़ान साहब हैं ,इस बार भारत आने पर उन्होंने जो सी डी दी थी JNU की उस मे तो भाई ने धुंआ कर दिया था. ......'' इसके बाद इनकी बात पर मैंने अपनी तरफ से एक टिप्पणी लिखी थी --- '' @ ……आपने लिखा – JNU में .” थैले भर रूपया, तीन घंटा भर का धमाल ” — लग रहा है कि किसी ”गुड पोयट” नहीं बल्कि किसी आइटम-बाज की हकीकत उसी के अंध-भक्त ने रख दी .. मैंने भी तो यही कहता आया हूँ कि वह ‘गुड पोयट’ नहीं बल्कि ”गुड थैला-बाज या धमाल-बाज ” है ! .. जैसे भी सही , रोष-रुदन में ही सही पर आपने कम-से-कम यह कबूला तो .. आभारी हूँ मित्र इसके लिए आपका !! '' 
यह मैंने एक नजारा पेश किया कि कुमार-प्रशंसक इतने धैर्यहत प्रजाति के हैं ! सोचने की जरूरत ही नहीं महसूस करते , ऐसी स्थिति में 'उचित अवस्थी' को एक अंधभक्तों की जाति-वर्ग  का प्रतीक माना जाना चाहिए ! उनके अन्य प्रशंसक भी प्रशंसा के सोपान-क्रम में भले ऊपर नीचे हों , पर आलोचना को लेकर अनुदारता कमोबेश सभी में है , ठीक यही अनुदारता कुमार विश्वास के अन्दर भी है , उन्होंने मेरी आलोचना के कमेन्ट को स्वयं डिलीट करके इस बात का परिचय भी दे दिया है | उनके लिए कविता बाज़ार में बेची जाने वाली वस्तु मात्र है |

कुमार विश्वास की सकारात्मक्ताएं/सफलताएं  :- कुमार विश्वास की ये सकारात्मक्ताएं भी हैं - 
१, ईश्वर ने उन्हें सुन्दर गला दिया है , जिससे वे अपनी कविताओं को कर्ण-प्रिय बना लेते हैं |  
२ , जनता के मूड के हिसाब से अपने आपको बदलने में माहिर हैं | तालियों को बटोरने के सारे हथकंडों पर अच्छी पकड़ |
३ , विज्ञान-वर्ग के छात्रों तक हिन्दी कविता (?) को पहुचाने का काम किया | बाजारी ढंग से ही सही | 
४ , बम्बइया द्वि-अर्थी संवादों की तर्ज पर ही सही पर हिन्दी कविता (?) को एक बड़े युवा-वर्ग के कानों-कानों तक घुसाया |
५ , अब तक के हिन्दी कवियों में आधुनिक तकनीक ( इन्टरनेट ..आदि ) का सबसे ज्यादा लाभ ले सकना | 
६ , स्वयं कथित अपनी कविता में कविता से इतर पुनरुक्तिदोष-पूर्ण  चुटकुलेबाजी को सफलता-पूर्वक चला देना 
७ , एक कवि से इतर परफार्मर के लक्षणों से पूर्ण होना |
८ , विदेशों में रह रहे भारतीयों की ओर 'कवि' के वेटेज के साथ तीव्रता के साथ बढ़ने की दूरदर्शिता |
९ , कुछ भावुक मसलों पर कविता लिखने की कला इनके पास है जिसमें दोयम दर्जे की कविता पर भी भावुक 'माइलेज' मिल जाता है |

कुमार विश्वास की नकारात्मक्ताएं/सीमाएं/असफलताएं :- ये भी बिन्दुवार ढंग से इस प्रकार हैं - 
१ , एक सफल 'परफार्मर' के तौर पर कुमार विश्वास भले लगते हैं पर खामखा को 'गुड पोयट' ( Its better to be a 'good poet ' than a bad engineer - का उद्घोष जाने कितनी बार ..को देखते हुए  ... ) कहना और उसके अनुकूल कवितायें न रख पाना / लिख पाना , उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है |
२ , एक अच्छे कवि में जो काव्य-विवेक होना चाहिए वह उनमें नहीं है | उनके लोकप्रिय होने की इच्छा ने उनके काव्य-विवेक को मार दिया है |
३ , उन्हें प्रसंगानुकूल और उचित  शब्दों का प्रयोग करना नहीं आता जो कि एक कवि के लिए बेहद जरूरी चीज है | 
४ , इस गीत ---   http://www.youtube.com/watch?v=Z01tIg6SS8A&feature=autofb  , में ऐसा देखा जा सकता है | अनूप शुक्ल जी का उचित ही कहना है - '' कवि हिमालय को ''बौना'' बनाये बिना भी शहीद को महान बता सकता था। हिमालय से अनुरोध करता तो वह शहीद के सम्मान में अपना माथा झुका देता। उससे कहते तो वह शहीद की याद में नदियों के रूप में बह जाता। लेकिन शायद कवि मजबूर है। उसका काम हिमालय को बौना बिना चल नहीं पायेगा। '' ... बाद में बात संज्ञान में आयी कि इसी गीत में उन्होंने शहीदों के लिए ''कंचनी तन '' शब्द-युग्म  का प्रयोग किया है | ''कंचनी'' शब्द का अर्थ वेश्या होता है , और इसी अर्थ में अब तक हिन्दी लेखन में प्रयुक्त होता आया है | क्या इसे भी शहीदों की शान में माना जाय ? , भयानक चूकें हैं ये सब ! , फिलहाल कुमार के पास शब्द और बिम्ब रख पाने की काबिलियत नहीं है | काव्य-दोषों से भरी है इनकी कविता ! 
५ , इस गीत ---  http://www.youtube.com/watch?v=A39xtbeaL70 , को देखा जाय | इसमें विदेश में जाकर ''आलिन्द '' शब्द के गलत अर्थ को न केवल कविता में बल्कि मुंह से बोल-बोल के बता रहे हैं कुमार विश्वास | इसका अर्थ कह रहे हैं - 'आँगन ' | गृह-स्थापत्य में आलिन्द घर के बाहर दरवाजे के बाहर की ओर के मैदान में उंचा उठा चबूतरा है ! अर्थ कितना भी खिसकेगा तब भी 'आलिन्द' दरवाजे के बाहर ही रहेगा | यह भी एक प्रमाण है उनके क्षीण शब्द ज्ञान  का ! 
६ , उनकी काव्य पंक्ति 'भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा' पर भौंरा और कुमुदनी की असंगति पर मैं पहले ही अपनी बात यहाँ रख चुका हूँ ---  ' सोच के आग्रह ' के रूप में ! 
७ , कविता में असली शक्ति के अभाव में 'नेम ड्रापिंग' का चस्का भी है कुमार विश्वास को | इस जगह देखें ---              http://www.youtube.com/watch?v=H5wtV9PpJPw&feature=related | यहाँ ग़ालिब जैसे अति लोकप्रिय शायर के बहु-उधृत  शेर को गलत पढ़ रहे हैं , उनका आत्म-विश्वास भी देखने लायक है | अज्ञानता के आत्मविश्वास को इतनी सफलता पाते मैंने और कहीं नहीं देखा था | कुमार साहब पढ़ रहे हैं --- ''  मत पूछ की क्या हाल है मेरा तेरे आगे / तू देख के क्या रंग है मेरा तेरे आगे ! '' जबकि महान शायर ग़ालिब का यह खूबसूरत शेर इसतरह है --- '' मत पूछ के क्या हाल है मेरा तेरे पीछे / तू देख के क्या रंग तेरा मेरे आगे // '' | ''पीछे'' को रखे बगैर इस शेर का तुक नहीं बन रहा और यही शब्द गायब करते हैं ये |  ऐन इसी वक़्त कुमार विश्वास जी के प्रशंसक गौतम राजरिशी जी की बात को भी रखना अनुपयुक्त न होगा --- ''  ( कुमार साहब ) हिंदी के रीतिकालिन कवियों से लेकर ऊर्दु के लगभग हर उन शायरों को जिन्हें आपने पढ़ा है, वो उनकी रचनायें, उनके शेर बकायदा संदर्भ सहित सुना सकते हैं। ''
८ , कुमार विश्वास अपने समकालीन रचनाकारों का आदर करना तो दूर उनपर आपत्ति जनक कमेन्ट भी करते रहते हैं | बुकर जैसे बड़े सम्मान को पा चुकी अरुंधती राय की सृजनशीलता को देखने की इनकी दृष्टि ज़रा देखिये यहाँ ---  http://www.youtube.com/watch?v=D9uzD4jLshI  | किसी लेखिका को यह कहना कि वह अपने जीवन के अश्लील प्रसंगों को लिखकर फेमस हो कर बुकर सम्मान पा गयी , उस लेखिका के साथ अन्याय है | यह तो लांछन लगाना है , कुमार की कुंठा व्यक्त होती है यहाँ | जिन लोगों को मैं कुंठित लग रहा हूँ उनको यहाँ पर भी कुंठा को देखना चाहिए और फिर 'कुंठा' पर पुनर्विचार करना चाहिए | अरुंधती जी चाहें तो मानहानि का दावा भी कर सकती हैं | अगर विभूति नारायण राय द्वारा 'छिनाल' शब्द का प्रयोग आपत्तिजनक हो सकता है तो यहाँ भी जो कहा गया वह कम आपत्तिजनक नहीं ! ऐन इसी वक़्त पर कुमार विश्वास के प्रशंसक अपूर्व शुक्ल जी की बात रखना चाहूँगा --- '' उनकी विद्वत्ता, उनकी प्रत्युत्पन्नमति और उससे भी अधिक उनकी सरलता प्रभावित करती है.'' | क्या विद्वत्ता , सरलता आदि गुण व्यक्तित्व की सर्वांगीणता में नहीं होने चाहिए ! 
९ , प्रत्युत्पन्नमति के रूप में उनकी सराहना भी मुझे अतार्किक लगती है | उनके यहाँ सस्ती चुटकुलेबाजी दिखती है | प्रत्युत्पन्नमति वह है जो किसी भी नयी बात पर एक नए तरीके से ‘ह्यूमर’ की नवीनता के आग्रह को व्यक्त करती हुए सामने वाले को प्रभावित करे | इसमें मुख्यतया नयेपन का आग्रह है | चुटकुला जाने कितनी बार और कहाँ कहाँ बोला जाता है , इसका भी अपना महत्व है , पर यह वह नहीं है , कुमार तो एक चुटकुले को अधिकाँश परफार्मेंस में औंटते रहते हैं | उसमें प्रत्युत्पन्नमति का कमाल नहीं , सस्ती चुटकुले-बाजी का धमाल है ! इनकी चुटकुले-बाजी भी अधिकांशतः निकृष्ट कोटि की है जिसपर वह भूरि-भूरि यौनिकता/अश्लीलता की छाया रखने की कोशिश करते रहते हैं ! द्विअर्थी संवादों की कोटि का प्रयास ही रहता है उसके यहाँ |
१० , कुछ लोग कुमार विश्वास की प्रसिद्धि को उनकी श्रेष्ठता भी मान लेते हैं | तालियों की बटोर और अंतर्जालिक 'डाउनलोड' जैसी चीजों को उनकी श्रेष्ठता बताते हैं | डाउनलोड होना किसी श्रेष्ठता का सूचक नहीं , अश्लील फ़िल्में या दृश्यों के टुकड़े तो बहुत डाउनलोड होते हैं पर वे ‘श्रेष्ठ’ फिल्म या दृश्य नहीं कहे जाते | गुलशन नंदा के उपन्यास प्रेमचंद से ज्यादा बिकते हों तो इसका मतलब यह नहीं कि गुलशन नंदा प्रेमचंद से बड़े या श्रेष्ठ कथाकार भी हुए | ‘प्रसिद्धि’ और ‘श्रेष्ठता’ दो अलग अलग चीजें हैं |
११ , कुमार विश्वास मंचीय कविता की उस गौरवशाली परम्परा के साथ भी अन्याय कर बैठे हैं , जिसमें लोकप्रियता के साथ जन-पक्ष-धरता थी | ६२' के चाइना युद्ध पर सफल मंचीय कवि गोपाल सिंह नेपाली की पंक्तियाँ जनता के लिए कंठहार बन गयी थीं | कुमार की कविता में प्रसिद्धि होने के बाद भी सामाजिक सकारात्मकता नहीं है | कुमार , बच्चन-नेपाली-नीरज-रमानाथ अवस्थी-सोम ठाकुर आदि की सफल और उपयोगी मंचीय परम्परा के वाहक नहीं हैं | कुमार को अगर किसी की परम्परा से जोड़ा जा सकता है तो गुलशन नंदा - वेद प्रकाश शर्मा के ऐयारी गद्य की काव्यात्मक प्रवृत्ति के तौर पर बनने वाली परम्परा से जोड़ा जा सकता है जिसके लिए कविता विशुद्ध ऐशो-आराम की चीज रही हो | हुल्लड़ और कुल्हड़ कविता के दाय नहीं हो सकते | 
१२ ,  कुमार को चाहिए कि जैसा मन कहे वैसा लिखें पर स्वयं को 'कबिरा दिवाना था , मीरा दिवानी थी' की परम्परा में रखकर हिन्दी का 'गुड पोयट' कहकर इस परम्परा के साथ अन्याय न करें | कबीर तो 'निंदक नियरे राखिये' कहते थे और ये तो अपनी की गयी समालोचना को भी बर्दाश्त नहीं कर पाते | कविताई पर प्रश्न खडा करने वाले कमेन्ट तक डिलीट कर देते हैं | 
--- कुमार की कवितायें मैंने कविताकोश पर देखीं पर उनमें श्रेष्ठता का नितांत अभाव लगा और अब प्रसंग लंबा हो रहा है , और अगर इतनी आलोचना किसी को समझ में नहीं आ पाए तो शास्त्रीय आलोचना भी समझ से परे होगी | और इसके लिए मैं कुमार से पहले हिन्दी ब्लॉग जगत में ही मौजूद  जाने कितने कवियों को चुनूंगा , जो ज्यादा दावा रखते हैं अपनी कविता पर बात होने के लिए | मेरा यह प्रयास कुमार की 'प्रसिद्धि' और 'श्रेष्ठता' का 'मिसमैच' कर रहे लोगों में सोच के आग्रह भर का था और यह मुद्दा मैं गौतम जी की पोस्ट से उठाये हुए था , इसलिए भी आज इस पोस्ट तक चला आया |

निष्कर्ष  :- निष्कर्ष के तौर पर मैं  अनूप भार्गव जी की बात को रखना चाहूँगा --- 
१) '' मुझे शिकायत सिर्फ़ इस बात से है कि वह कवि सम्मेलनों में भीड़ तो जुटा रहे हैं लेकिन कवि सम्मेलनों को कविता से दूर ले जा रहे हैं । यदि आप यह मानते हैं कि उन की प्रस्तुति में जो ९०% से अधिक होता है , वह कविता है तो मुझे आप से कुछ नहीं कहना है । ''
२) ''अजीब बात है कि वह ’ प्रतुत्त्पन्मति’ से उसी परिहास को हर कवि सम्मेलन में बार बार जन्म दे देते हैं । कुछ परिहास तो पहले से ही अन्य कवियों द्वारा रचे हुए होते हैं , उन्हें सिर्फ़ दोहराना होता है । कविता को तो कवि से जोड़ा जा सकता है लेकिन इन परिहासों को किस से जोड़ा जाये ? जिस नें पहले सुना दिया उसी के हो गये । नीरज जी भी ’कारवां गुज़र गया’ को बार बार सुनाते हैं लेकिन
१) वह गीत उन का अपना होता है और
२) अच्छी कविता को कई बार सुना जा सकता है , ’मैं आप को आगरा में ढूँढ रहा था’ पर बार बार हँसना मुश्किल होता है । ''
--- इसप्रकार कुमार विश्वास को कोई सफल परफार्मर कहे , कोई आपत्ति नहीं पर हिन्दी का 'श्रेष्ठ कवि' कहने में मुझे आपत्ति है | कविता का वह दाय नहीं है जो कुमार विश्वास निभा रहे हैं | उनकी 'कविता' (?) पर कुछ समझदारों  को भी लहालोट होते देखकर कहना ही पड़ता है .............. 'या इलाही ये माजरा क्या है ' !! 
kavi - gorakh pandey.. 
अंत में,  उन्हीं कवि गोरख पांडे , जिनका ऊपर उचित अवस्थी ने मजाक उड़ाते हुए जिक्र किया है , उनकी एक कविता रखूंगा | गोरख JNU के प्रतिभावान छात्र थे , असमय काल-कवलित हुए | इनके लिखे गीत आज भी भोजपुरी इलाके की श्रमशील महिलाओं के कंठों से कूजित होते हैं | कविता के हेतु के लिए उचित अवस्थी और कुमार विश्वास दोनों को कवि गोरख की इस कविता से प्रेरणा लेनी चाहिए .. .. .. 
'' उलटे अर्थ विधान तोड़ दो ,
शब्दों में बारूद जोड़ दो ,
अक्षर अक्षर पंक्ति पंक्ति को ,
छापामार करो ---
कविता युग की नब्ज धरो ! ''(~ कवि गोरख पांडे )



नोट :-
१) मैंने कुछ बातें/सन्दर्भ , टीप - प्रतिटीप आदि के तौर पर श्री अनूप शुक्ल जी के ब्लॉग से साभार लिया है |कविता में बिम्ब-विधान आदि औचत्य के लिए अनूप जी की इस पोस्ट - कल्पना का घोड़ा,हिमालय की ऊंचाई और बिम्ब अधिकार आयोग - को देखना समीचीन होगा ! 
२) मैंने पोस्ट में श्री गौतम राजरिशी जी का नाम लिया है जो मेरे प्रिय ब्लागर हैं जिनसे लड़ना-सीखना भी होता है |
३) मैंने पोस्ट में श्री अपूर्व शुक्ल जी का नाम लिया है , ये मेरे प्रिय कवियों में हैं , उस दिन की कल्पना मात्र से ही दुखी हो जाता हूँ जब ब्लॉग जगत इनकी कविताओं से वंचित होने लगे | इनका व्यक्तित्व भी कवितामय है | पर जब इनकी कविता कुमार-गी होने लगेगी तो सर्वाधिक दुखी होउंगा मैं , और अपनी मंद-मति से डाटून्गा भी ! 
४) पोस्ट में मैंने जिन वीडियोज का लिंक दिया है , अधिकाँश को डाउनलोड भी कर लिया है , ताकि साक्ष्य की दृष्टि से पुख्ता रहा जाय |
५) चित्र साभार गूगल से |   


शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की ' अंतिम आकांक्षा ' ..

                                                              
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ( १८८४-१९४१ ) :
                आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है | आज हम हिन्दी
साहित्य के इतिहास को आचार्यवर से अलग करके नहीं देख सकते | हिंदी साहित्य के इतिहास के
'काल-विभाजन' और 'नामकरण' दोनों में हम उनके प्रति कृतज्ञ  हैं | इसके अतिरिक्त शुक्ल जी हिन्दी
साहित्य के प्रथम व्यवस्थित आलोचक हैं | ' व्यावहारिक' और 'सैद्धान्तिक', दोनों तरह की आलोचना को
उन्होंने संस्कार दिया | निबंध लेखन में शुक्ल जी एक युग का प्रतिनिधित्व करते हैं यानी 'शुक्ल युग ' |
                आचार्य के जीवन का आरंभिक और अधिकांश समय मिर्जापुर , उ.प्र. में बीता था | यहीं उनके
साहित्यिक व्यक्तित्व का आरम्भ और विकास हुआ | यहाँ के प्रति उनकी भावुकता उनकी 'अंतिम आकांक्षा'
में व्यक्त है ---
                                  अंतिम आकांक्षा
'' लोंगों ने मुझे बनारसी समझ लिया है , यह मेरे साथ अन्याय है | मैं मिर्जापुर का हूँ और मिर्जापुर मुझे
अत्यंत प्रिय है | मैं मिर्जापुर की एक-एक झाड़ी , एक-एक टीले से परिचित हूँ | बचपन मेरा इन्हीं झाड़ियों
की छाया में पला है | मैं इन्हें कैसे भूल सकता हूँ | ''
               '' लोगों की अंतिम कामना रहती है कि वे काशी में मोक्ष लाभ करें , किन्तु मेरी अंतिम कामना
यही है कि अंतिम समय मेरे सामने मिर्जापुर का वही प्रकृति का दिव्य खंड हो , जो मेरे मन में भीतर -
बाहर बसा हुआ है | ''
              '' आपने कवि सम्मलेन की आयोजना पुस्तकालय भवन में की है , यह ठीक नहीं | दूसरी बार
कवि सम्मलेन कीजिये , तब पहाड़ पर , झाड़ियों में कीजिये , जब पानी बरस रहा हो , झरने झर रहे हों ,
तब मैं भी हूँगा और आप लोग भी | तब मिर्जापुर के कवि सम्मलेन का आनंद रहेगा | यों तो कवि सम्मलेन
सर्वत्र ही होते ही रहते हैं | ''
                                     [ साहित्य सन्देश , अप्रैल-मई , १९४१ से साभार ]
{ मृत्यु से कुछ दिनों पूर्व आचार्य शुक्ल मिर्जापुर गए थे | वहां २५-२६ जनवरी १९४१ को कवि सम्मलेन
आयोजित किया गया था | आचार्य शुक्ल को कवि सम्मलेन में सभापति के रूप में बुलाया गया था | आचार्य
शुक्ल और सोहनलाल द्विवेदी के मध्य हुई बातचीत का यह अंश है }
                                     [ आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली,भाग-८,संपा.डा.ओ.पी.सिंह, से साभार ]
एक बात और , काशी के मोक्ष लाभ से खुद  को अलग रखने  के सम्बन्ध में सहज ही कविवर कबीर दास का
ध्यान आ गया और उनकी प्यारी सी भोजपुरी कविता की पंक्ति , ---
                            '' लोकामति के भोरा रे ..
                              जौ कासी तन तजै कबीर रामहिं कौन निहोरा रे .. ''